Saturday, April 28, 2012

शुक्र ग्रह का पारगमन, 6 जून 2012 Transit of Venus June 6, 2012

शुक्र ग्रह का पारगमन, 6 जून 2012 Transit of Venus June 6, 2012
6 जून 2012 को शुक्र का सूर्य पर दुर्लभ पारगमन होगा और इस घटना को पूरे देश मे देखा जा सकेगा।
6 जून 2012 को शुक्र ग्रह का पारगमन होने जा रहा है, अर्थात् शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से होकर गुजरेगा। देखने के लिहाज से बेशक यह घटना पूर्ण सूर्यग्रहण जैसी भव्य नहीं होगी लेकिन यह बहुत दुर्लभ खगोलीय घटना होने के कारण खगोलविज्ञानियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह जानना रोचक है कि पिछले पारगमन 1874, 1882 और 2004 में हुए थे और आज इन तीनों परिघटनाओं का कोई भी गवाह इस दुनिया में नहीं है। अगर आपने 8 जून 2004 का शुक्र पारगमन देखा तो आप निश्चित रूप से 6 जून  2012 को इस घटना को दुबारा देख पाने वाले भाग्यशाली लोगो में से होंगे।

पारगमन क्या होते हैं?

चित्र में धरती से देखने पर शुक्र के सम्पर्क के क्षणों को दिखाया गया है।
धरती के अलग अलग स्थानों से देखने पर सम्पर्क के समय में कुछ सेकण्ड
या मिनट का अंतर होता है। यह पूरी घटना 6 घंटे का समय लेती है। चित्रा
में दिया गया समय अंतरराष्ट्रीय मानक समय अथवा ग्रीनविच समय है।
जब चांद, पृथ्वी और सूर्य के बीच में आता है तो इसे सूर्यग्रहण कहा जाता
है। मगर शुक्र या बुध जैसे आंतरिक ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच आते हैं
तो यह घटना पारगमन कहलाती है। 6 जून 2012 को हमें मौका मिल रहा
है कि हम शुक्र ग्रह को सूर्य के आगे से गुजरता हुआ देख पायेंगे। लेकिन

2004 की तरह हम पारगमन के पूरे घटनाक्रम को भारत से नहीं देख सकेंगे।
यहां पर जब सूर्य उगेगा तो शुक्र पारगमन की अवस्था में आ चुका होगा।
धरती से देखने पर शुक्र और बुध ग्रह का आकार चांद के मुकाबले बहुत छोटा
है। इसलिए जब ये सूर्य के सामने से गुजरते हैं तो एक छोटे से काले बिंदु
जितना ही आकार बना पाते हैं। ग्रह पारगमन के समय सूर्य के सामने से
गुजरते हुए कैसा रास्ता तय करेगा यह उसकी गति की ज्यामिति पर निर्भर
करता है। पारगमन की घटना आम तौर पर बहुत कम होती है क्योंकि पृथ्वी
की दीर्घ वृत्तीय कक्षा और इन ग्रहों की कक्षाओं के बीच थोड़ा सा झुकाव
होता है। इस झुकाव के कारण ये ग्रह पृथ्वी की कक्षा के दीर्घवृत्तीय तल से
कुछ ऊपर (उत्तर) या नीचे (दक्षिण) रहते हैं।
बुध ग्रह का पारगमन एक सदी मे 13 से 14 बार देखा जा सकता है।
इक्कीसवीं सदी का पहला बुध पारगमन 7 मई, 2003 को देखा गया जिसे
पूरे देश में देखा गया था। जबकि शुक्र का पारगमन ग्रहों की व्यवस्था में
अधिक दुर्लभ घटना है। वास्तव में दूरबीन के आविष्कार के बाद केवल 7
बार यह घटना हुई है (1631,1639,1761,1769,1874, 1882, और 2004)।
शुक्र का पारगमन क्या है?
जब शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से होकर गुजरता है तो यह घटना शुक्र पारगमन कहलाती है। इसघटना के समय शुक्र ग्रह एक छोटे काले चक्के जैसा (सूर्य के ऊपर से) धीरे-धीरे चलता हुआ दिखता है।
शुक्र और बुध की कक्षाएं पृथ्वी की कक्षा के भीतर हैं इसलिए केवल ये ग्रह ही पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरते हैं। पारगमन एक बहुत दुर्लभ खगोलीय घटना है और शुक्र का पारगमन बुध के पारगमन की तुलना में और भी अधिक दुर्लभ है। बुध के पारगमन की बात करें तो यह औसतन एक शताब्दि में तेरह बार होता है, जबकि शुक्र पारगमन 243 सालों में केवल चार बार ही होता है। यह घटना जोड़े में होती है, दो पारगमन 8 साल के अंतराल में होती हैं और अगले दो पारगमन एक शताब्दि से भी अधिक समय बाद होते है।
शुक्र पारगमन कब होता है? पारगमन कब-कब देखे गए?
शुक्र पारगमन की दुर्लभ परिघटना 6 जून 2012 को होने जा रही है। इसके बाद यह परिघटना दिसम्बर 2117 और दिसम्बर 2125 में होगी। इससे पहले यह 2004 में हुआ था। इस घटना को देखने का पहला प्रमाण 1639 में मिलता है जब खगोलशास्त्री जेरेमिया होरॉक्स ने इसे देखा था, यह दूरदर्शी के आविष्कार के तीन दशक बाद की बात है। इसके बाद 1761, 1769,1874,1882 और 2004 में शुक्र पारगमन को देखा जा सका। 1761 और 1874 के पारगमन भारत से पूर्ण रूप से देखे गए। 8 जून 2004 का पारगमन भी भारत से पूरी तरह देखा गया था जबकि 6 जून 2012 को होने वाले पारगमन में भारत से पहला और दूसरा संपर्क नहीं दिखाई देगा। जब सूर्योदय होगा तो शुक्र सूर्य के सामने जा चुका होगा। दुबारा 9 जून, 2225 को ही पूरा पारगमन भारत से देखा जा सकेगा।
शुक्र का पारगमन इतनी दुर्लभ घटना क्यों है?
शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव
शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव शुक्र पारगमन का दोहराव एक विचित्रा पैटर्न में होता है। 1882 के बाद यह घटना 121.5 साल बाद जून  2004 में हुई, इसके 8 साल बाद 2012 में देखी जा सकेगी। 2012 के बाद शुक्र पुनः पारगमन की परिघटना 105.5 साल बाद होगी जबकि उसके बाद यह 8 साल बाद होगी। शुक्र पारगमन की घटना की आवृत्ति में इतना बड़ा अंतर पृथ्वी और शुक्र की कक्षीय तलों में अंतर के कारण होता है। अगर शुक्र और पृथ्वी सूर्य के साथ समान तल में होते तो पारगमन की आवृत्ति अधिक होती।
सभी राज्यों की राजधानियों के शुक्र पारगमन की समय सारणी 







एडमण्ड हैली (1656-1742) ने महसूस किया कि पारगमन सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी को नापने में महत्वपूर्ण हो सकता है। जैसा कि हमें पता है कैपलर का नियम हमें ग्रहों के बीच की सापेक्ष दूरियों के बारे में बताता है, लेकिन इससे सही दूरी का पता नहीं चलता।  हैली अपने जीवन काल में शुक्र पारगमन की कोई घटना नहीं देख पाया  किन उसकी कोशिशों का असर 1761 और 1769 के अवलोकनों पर पड़ा और खगोलशास्त्री पहली बार धरती से सूरज की दूरी का ठीक ठीक अनुमान लगा पाने में सक्षम हुए। एक समय में धरती के अलग-अलग जगहों से देखते  हुए सामान्य ज्यामितिका उपयोग करके हम सूर्य तक की दूरी जान सकते हैं। आज हमारे पास इसके लिए बहुत सही माप बताने वाली कई विधियां हैं पर 18वीं और 19वीं में बारीकी से किए गए अवलोकनों से हमे जो परिणाम मिले उनमें 1 प्रतिशत ही त्राुटि है। पृथ्वी के दो अलग अलग स्थानों से अवलोकन करने पर सूर्य पर शुक्र के दो अलग अलग रास्ते दिखाई देते हैं। दोनों रास्तों से सूर्य के एक किनारे से दूसरे किनारे को तय करने में समय का जो थोड़ा सा अंतर आता है, उसकी सहायता से कुछ गणनाएं कर कधरती से सूर्य की दूरी को आसानी से जाना जा सकता है। इसी तरह सौरमण्डल के आकार की भी गणना की जाती है। एडमण्ड हैली ने विभिन्न राष्ट्रों को सलाह दी कि वे दुनिया भर में भावी पारगमन की घटनाओं के  अवलोकन के लिए अभियान दल भेजें। 17वीं और 18वीं शताब्दि के साहसी खोजियों ने जोखिम और अवसाद को चुनौती दी और उस समय के सबसे बड़े सवाल को हल करने की कोशिश की और कठिनाई भरी समुद्री यात्राएं की। उन साहसी लोगों मे से सब अपने घर वापसी के लिए सफर शुरू  नहीं कर पाए।
जैसाकि शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव है इसलिए जब भी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है तो वह सूर्य से थोड़ा सा ऊपर या नीचे होता है और सूर्य की तेज चमक के कारण दिख नहीं पाता। जब कभी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच नोड्स से गुजरता है और ये तीनों एक सरल रेखा पर स्थित हो तो पारगमन दिखाई देता है। नोड्स वे बिंदु कहलाते हैं जहां पर शुक्र की कक्षा पृथ्वी के दीर्घवृत्तीय कक्षीय तल को काटती है।
जिस जगह पर ग्रह दक्षिण से उत्तर की ओर आते हुए कक्षीय तल को काटता है उसे आरोही नोड कहते हैं जबकि जिस बिंदु पर ग्रह उत्तर से दक्षिण की ओर आते हुए कक्षीय तल को काटता है उसे अवरोह नोड कहते हैं। शुक्र को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में 225 दिन का समय लगता है जबकि पृथ्वी 365 दिन में सूर्य का चक्कर पूरा करती है। इसका मतलब है कि जब शुक्र नोड से होकर गुजरे तब पृथ्वी भी वहां से गुजरे ये जरूरी नहीं। इसीलिए जब ये संयोग होता है तभी शुक्र पारगमन होता है। पारगमन की आवृत्ति के पीछे कुछ और प्रभाव भी असर करते हैं। 2004 का पारगमन अवरोही नोड के पास दिखा था। 2012 में होने वाला पारगमन भी अवरोही नोड के पास ही दिखाई देगा।
शुक्र पारगमन की घटना का क्या महत्व है?
शुक्र पारगमन की घटना हमारा ध्यान ग्रहों की जटिल गतियों, केपलर के नियम, गति और गुरुत्व आदि की ओर खींचती है। पारगमन की दुर्लभता और दोहराव हमें दिखाते हैं कि खगोलीय घटनाओं के पूर्वानुमान की गणना में किस तरह की कठिनाइयां आती है। 1761 के पारगमन ने मिखाइल लोमोनोसोवनाम के वैज्ञानिक को एक अवसर दिया जिससे वह सिद्ध कर पाया कि शुक्र ग्रह में वातावरण है। इस वातावरण को एक धुंधले आभामंडल के रूप में देखा गया था। शुक्र पारगमन के अवलोकन से शुक्र ग्रह के आकार के बारे में भी जानकारी मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि पारगमन के अवलोकन के द्वारा हमें पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी को ज्ञात कर सकते हैं
ब्लेक ड्रॉप इफैक्टका अर्थ-
ब्लेक ड्रॅाप प्रभाव
ब्लेक ड्रॅाप प्रभाव- पिछले शुक्र पारगमन की घटनाओं का अवलोकन करने में सबसे बड़ी समस्या यह देखने में आई कि शुक्र ठीक किस क्षण सूर्य के ऊपर पूरी तरह आया, यह निर्धारित करना कठिन हो गया। यह क्षण जब शुक्र पूरी तरह सूर्य के ऊपर आता है वह क्षण दूसरे सम्पर्कका क्षण कहलाता है। यह क्षण बहुत महत्वपूर्ण होता है जब शुक्र पूरी तरह से सूर्य के भीतरी किनारे से चिपका हुआ दिखता है। इसके तुरंत बाद शुक्र सूर्य के सम्पर्क बिंदु के पास खिंचा हुआ दिखता है जिसके कारण शुक्र का आकार कुछ बिगड़ा हुआ लगने लगता है। जब शुक्र सूर्य के भीतरी किनारे से अंदर की ओर खिसकना शुरू होताहै तो अवलोकन करने वाले के लिए सम्पर्क के क्षण का ठीक ठीक अवलोकन कर पाना बहुत ही कठिन हो जाता है। इस रहस्यमयी ब्लैक ड्रॉप इफैक्ट के कारण सम्पर्क का सही अवलोकन नहीं हो पाता। ब्लैक ड्रॉप इफैक्टदो प्रभावों के कारण होता है। एक तो दूरबीन के कारण छवि का स्वाभाविक रूप से धुंधला होना जिसे जीम 'Point spread function' कहा जाता है और यह वातावरण में होने वाले विक्षोभ के कारण होता है। दूसरा सूर्य के किनारे पर चमक के कम होने के कारण होता है जिसे खगोलविज्ञानी 'Limb Darkening'  के नाम से जानते है।
06 जून, 2012 को शुक्र पारगमन कहां से दिखेगा?
शुक्र पारगमन पथ अर्थात शुक्र जिस जगह से दिखाई देगा इस चित्र के माध्यम से वह दर्शाया गया है।
नोट : राजनीतिक मानचित्र नहीं है।

06 जून, 2012 का पारगमन रुस, मंगोलिया, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, अलास्का, न्यूजीलैंड इत्यादि पेसीफिक द्वीपों से दिखेगा। आस्ट्रेलिया, इन्डोनेशिया, बर्मा, मलेशिया और भारत के अलावा अतिरिक्त पश्चिमी एशिया के देशों में सूर्योदय के समय पारगमन शुरु हो चुका होगा। भारत में पारगमन के सम्पर्क 1 और सम्पर्क 2 सूर्योदय से पहले ही हो चुके होंगे, पर महत्म पारगमन तथा सम्पर्क 3 और 4 देखें जा सकेंगे।
पारगमन को देखना कितना सुरक्षित है?
सूर्य को कभी भी दूरबीन या खुली आंखों से सीधे नहीं देखना चाहिए। बिना सुरक्षा उपकरणों के सूर्य को देखने से आंख में स्थाई क्षति या अंधापन हो सकता है। सूरज को देखने का सबसे सुरक्षित और सुलभ तरीका है उसका प्रक्षेपण (Projection) करके छवि देखना। इसके लिए किसी पिनहोल या महीन छिद्र को किसी परदे से एक मीटर दूरी पर खते हैं जिससे परदे पर सूर्य का प्रतिबिंब बन जाता है।
किसी दूरबीन को ट्राइपॉड पर लगाकर उससे भी सूर्य का अच्छा और बड़ा प्रतिबिंब किसी सफेद परदे पर लिया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि कोई इससे सीधे सूर्य को न देखे। प्रक्षेपण विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमें सूर्य को सीधे देखने की जरूरत नहीं होती।
क्या करें?
केवल सौर डिस्क का प्रक्षिप्त बिम्ब देंखे।
दूरबीन/बाइनाक्यूलर और पिनहॉल कैमरे से सूर्य के बिम्ब का प्रेक्षेपण पिन होल, दूरबीन या बाइनाक्यूलर की एक जोड़ी द्वारा एक छायादार दीवार पर सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रेक्षिपित करें।
केवल वैज्ञानिक रूप से जांचे गये सौर फिल्टर का इस्तेमाल करक ही सूर्य की ओर देखना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि सिर्फ तीक्ष्ण दृष्टि वाले व्यक्ति ही सूर्य के डिस्क पर शुक्र को एक छोटे काले धब्बे के रूप में देख सकेंगे। पारगमन के दौरान काला धब्बा सौर डिस्क के उत्तरी भाग में पूर्व से पश्चिम की ओर पार करता दिखाई देगा।
क्या न करें?
बिना सुरक्षित सौर फिल्टर के, खुली आंखों से पारगमन की किसी भी कला को देखने का प्रयास न करें।
दूरबीन या बाइनाक्यूलर से सीधे कभी न देखें।
धुएंदार कांच, रंगीन फिल्म, धूप के चश्मे, अनवरित श्वेत-श्याम फिल्म, फोटोग्राफिक ट्रल डेन्सिटी फिल्टर तथा पोलराइजिंग फिल्टरों का इस्तेमाल न करें। ये सभी सुरक्षित नहीं हैं।
फिल्टर के साथ भी सूर्य की ओर लगातार न देखें, कुछ सकेंड के अंतराल पर देखें।
संदर्भ : श्री बी.के. त्यागी जी 
द्वारा : दर्शन बवेजा विज्ञान अध्यापक सी.वी.रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर हरियाणा 

Thursday, April 05, 2012

छह जून को शुक्र पारगमन The Transit of Venus 06 June 2012

छह जून को शुक्र पारगमन The Transit of Venus 06 June 2012
भाग - १ Part-1
अपने परिक्रमा पथ पर सूर्य की परिक्रमा करते हुए जब सूर्य और पृथ्वी के बीच के ग्रह सूर्य और पृथ्वी की सीध में आते हैं तब इस घटना को पारगमन कहा जाता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच शुक्र ग्रह के सीध में आने की घटना को शुक्र पारगमन कहा जाता है और बुध के सीध में आने की घटना को बुध पारगमन।
जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तब सूर्य ग्रहण होता है। जब बुध या शुक्र सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तो उसे पारगमन कहा जाता है। चूंकि बुध और शुक्र ग्रह पृथ्वी से काफी दूर स्थित हैं इसलिए वे पारगमन के दौरान एक छोटा काला धब्बा बनाते हैं जो सूर्य की तीव्र प्रकाशित डिस्क पार करने के लिए कई घंटे लेता है। 
छह जून 2012 को सुबह 5 बजे से 9 बजकर 52 मिनट तक सूर्य के भीतर शुक्र गृह की चाल देखी जाएगी। इस सदी की यह आखिरी शुक्र पारगमन की घटना होगी। लेकिन 2004 की तरह इस पारगमन के पूरे घटनाक्रम को हम यहाँ भारत में नहीं देख सकेगें क्यूंकि जब भारत में सूर्योदय होगा तो शुक्र पारगमन शुरू हो चुका होगा इसके बाद यह खगोलीय घटना 105 साल बाद देखी जा सकेगी। 
शुक्र की तरह बुध ग्रह का भी पारगमन होता है बुध पारगमन पृथ्वी से एक सदी में 13-14 बार देखा जा सकता है परन्तु शुक्र पारगमन ग्रहों की व्यवस्था के कारण दुर्लभ घटना है यह 243 वर्षों में केवल 4 बार ही होती है   इस 243 वर्षों के काल में शुक्र पारगमन की घटना युग्म वर्षों में होती है जैसे दो लगातार पारगमन 8 वर्ष के अंतराल पर होते हैं और बाकी के दो एक शताब्दी से भी अधिक के अंतराल पर।  

छह जून 2012 वाला शुक्र पारगमन 2004   के बाद 8 वर्ष वाला है और 2012 के बाद  उक्त घटना के लिए   105 साल का इंतजार  करना होगा
वर्तमान पीढ़ी के लिए यह आखरी शुक्र पारगमन होगा।
कि इस घटना के वक्त पृथ्वी से देखने पर शुक्र सूर्य के सामने से धीमी रफ्तार में क्रिकेट की गेंद के आकार में गुजरता दिखाई देगा। 
शुक्र पारगमन की घटना करीब छह घंटे तक चलेगी और यह नजारा पूरे भारत में देखा जा सकेगा।
इसके पूर्व 08 जून 2004 को शुक्र पारगमन हुआ था और इसके बाद इस वर्ष छह जून को होगा।
अप्रेल 2012 महीने   खत्म होने के बाद मई महीने के अंत तक शुक्र सूर्योन्मुखी हो जाएगा और सूर्य की ओर चलने लगेगा। इस बार शुक्र जब सूर्य के निकट पहुंचेगा तब एक अद्भूत खगोलीय घटना घटेगी। दरअसल, 6 जून को जब सूर्योदय होगा तब शुक्र सूर्य के ठीक सामने से गुजर रहा होगा। यह घटना शुक्र का पारगमन अथवा संक्रमण कहलाती है। इसके बाद ऎसी घटना अगली बार 105 साल बाद यानी वर्ष दिसम्बर 2117 में फिर दिसम्बर 2125 में ही देखने को मिलेगी। 
शुक्र ग्रह पिछले कई दिनों से हर रोज ज्यादा चमकीला होते हुए आसमान में उठता जा रहा है। इस माह के अन्त में वह तेजी से सूर्य की ओर बढ़ेगा और शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से गुजरेगा। 
सूर्य की डिस्क के सामने से शुक्र का पारगमन ग्रहीय पंक्तिबद्धता की दुर्लभ घटनाओं में से एक है और यह घटना अति महत्वपूर्ण भी है। 
दूरबीन के आविष्कार के बाद से सन 
1631, 1639, 1761, 1769, 1874, 1882 में केवल छह बार शुक्र पारगमन घटित हुआ है। 
 1761, 1874 और 2004  का शुक्र का पारगमन भारत में पूरे प्रवेशकाल से देखे गए हैं जबकि  छह जून 2012 के शुक्र पारगमन में  प्रवेशकाल जा चुका होगा  
शुक्र का पारगमन की आवृति में इतना बड़ा कालान्तर क्यूँ होता है ? शुक्र का पारगमन की घटना की आवृति में इतना बड़ा अंतर पृथ्वी और शुक्र के कक्षीय तलो में अंतर के कारण होता है शुक्र, पृथ्वी और सूर्य यदि एक समान तल में होते तो शुक्र पारगमन की घटना ज्यादा आवृति में होती। शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तालो में 3.4 अंश का झुकाव होता है इसलिए जब शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है सूर्य से थोड़ा उपर या नीचे होता है और सूर्य की तीव्र चमक के कारण दिख नहीं पाता। जब कभी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच नोड्स से गुजरता है और ये तीनो एक सरल रेखा पर स्तिथ  हो तो पारगमन दिखाई देता है नोड्स वे बिंदु होते हैं जहां शुक्र की कक्षा पृथ्वी के दीर्घवृत्तीय कक्षीय तल को काटती है ये नोड्स दो प्रकार के होते हैं आरोही और अवरोही 
शुक्र का सूर्य परिक्रमा काल 225 दिन का और पृथ्वी का  सूर्य परिक्रमा काल 365 दिन का होता है अर्थात दोनों का परिक्रमा काल एक सा ना होने के कारण दोनों एक साथ नोड से होकर नहीं गुजरती
कहाँ कहाँ दिखेगा छह जून 2012 वाला  शुक्र पारगमन

 सौर फिल्टर

सूर्य का अवलोकन कैसे करें और कैसे ना करें  सूर्य का अवलोकन सुरक्षित फिल्टर या परोक्ष प्रक्षेपण पद्धति द्वारा किया जा सकता है। इस खगोलीय घटना को देखने के लिए केवल वैज्ञानिक रूप से जांचे गए सौर फिल्टर का इस्तेमाल करके ही सूर्य की ओर देखना चाहिए। सुरक्षित सौर फिल्टर के बिना खुली आंखों से पारगमन की किसी भी कला को देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 
दूरबीन से सीधे कभी नहीं देखना चाहिए। धुएंदार शीशों , रंगीन फिल्मों , धूप के चश्मों , न्यूटल पोलराइजिंग फिल्टरों का भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ये सभी असुरक्षित हैं। 
शुक्र पारगमन की घटना को देखने के लिए श्याम पोलिमर फिल्म से बने फिल्टर भारत में कईं विज्ञान संस्थाएं उपलब्ध करवायेंगी। 
अवलोकन के दौरान सावधानियां इस अद्भुत नजारे को देखने से पूर्व जांच कर लेनी चाहिए कि फिल्म को कोई क्षति तो नहीं हुई है। बच्चों द्वारा इसका प्रयोग बड़ों के निरीक्षण में किया जाए। एक बार में इसका प्रयोग रुक-रुककर कुछ सेकण्डों के लिए ही करना चाहिए। आंखों की शल्य चिकित्सा या आंखों की बीमारी होने पर इसका प्रयोग न करने की सलाह दी गई है।
Image Credit: www.exploratorium.edu 
छह जून 2012 को कहाँ कहाँ दिखेगा शुक्र पारगमन रूस, मंगोलिया, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, अलास्का, न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, बर्मा, मलेशिया, भारत समेत अन्य पश्चिमी एशिया के देशो में दिखेगा 
भारत समेत अन्य पश्चिमी एशिया के देशो में पारगमन का सम्पर्क 1 व 2 सूर्योदय से पहले हो चुका होगा  परन्तु महत्तम  दशा और पारगमन का सम्पर्क 3 व 4  देखे जा सकेंगे 
प्रशिक्षण  शुरू ....
बाकी भाग -२ में ...........

प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :- दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा   

Saturday, March 17, 2012

प्रकाश के प्रयोग का बक्सा Optics Experiment Box

प्रकाश के प्रयोग का बक्सा  Optics Experiment Box 
  प्रकाश मंच  optical bench
कक्षा आठ व दस के छात्र प्रकाश के अपवर्तन और परावर्तन के पाठ में अक्सर ये प्रश्न करते हैं कि जो आप प्रकाश की किरण(ray diagram of refraction of light को ब्लैक बोर्ड पर बनाते है वो प्रकाश की किरणे क्या हम देख सकते हैं?
यही प्रश्न वो प्रकाश मंच (optical bench) के पास प्रयोग करते समय पूछते है कि उल्टा प्रतिबिम्ब तो बन गया पर प्रकाश की किरणे फिर भी नहीं दिखी 
बात तो बच्चों की बिलकुल सही है 
वो तो प्रकाश की किरणे वैसे ही देखना चाहते हैं, 
जैसी कि मैंने श्यामपट पर बना कर दिखाई थी, 
जैसी उनकी पाठ्यपुस्तक में चित्र दिखाया गया है 
आज कल उच्च तकनिकी युक्त विद्यालयों में जहां ई-कक्षाएं शुरू हो गयी है या फिर कम्प्यूटर द्वारा पाठ्यक्रम करवाया जाता है वहाँ पर वे एनिमेशन के माध्यम से यह देख सकते है परन्तु कम सुविधाओं वाले या सुविधाविहीन विद्यालयों में कोई ना कोई नवाचार युक्त प्रयोग ही बच्चों को यह दिखा सकता है कि प्रकाश की किरणे कैसे चलती हुई दिखती है 
कैसे वो अपवर्तन refraction परावर्तन reflation को होता हुआ देख सकते है 
उत्तल लेंस, अवतल लेंस, उत्तल दर्पण, अवतल दर्पण, प्रिज्म, कांच का गुटका, समतल दर्पण से प्रकाश की किरणों के टकराने और गुजरने की प्रक्रिया को देख सकते हैं 
इस समस्या के निवारण के लिए एक प्रकाश के प्रयोग का बक्सा Optics Experiment Box बनाया गया 
इस प्रकाश के प्रयोग के बक्सा Optics Experiment Box से बच्चे संतुष्ट हुए और उन्होंने फोकस बिंदु को भी देखा
कैसे बनाएँ प्रकाश के प्रयोग का बक्सा Optics Experiment Box ?
Optics Experiment Box 
आवश्यक सामग्री व बनाने की विधि: जस्ती लोहे की चद्दर का डेढ़ फुट लंबा एक फुट चौड़ा व आधा फुट ऊँचा बाक्स, खुलने वाले ढक्कन और छत वाले फलक पर कांच की शीट लगवा लेते हैं
दो लेजर पेन्सिल टार्च,एक एक उत्तल लेंस, अवतल लेंस, उत्तल दर्पण, अवतल दर्पण, प्रिज्म, कांच का गुटका, समतल दर्पण,धूप या अगरबत्ती, सफेद कागज आदि
कांच की शीट को टेप से चिपका कर फिक्स कर लें
बाक्स के अंदर एक लेंस आदि रखने के लिए एक लकड़ी या जस्ती चद्दर का ही मंच बनवा ले
अपवर्तन refraction परावर्तन reflation को होता हुआ देखें 
उस मंच पर क्ले की सहयता से सभी लेंस व दर्पण सीधे खड़े कर लें
धूप या अगरबत्ती जला कर बाक्स के भीतर रख देते हैं थोड़ी देर में जब बाक्स के अंदर धुंआ फ़ैल जाए तो धूप या अगरबत्ती को बाहर निकाल लेते हैं   
दो पेन्सिल लेजर टार्च ले कर बारी बारी लेंस, दर्पण,स्लैब, प्रिज्म पर लेजर बीम डालें
अब आप आपतित, अपवर्तित,परावर्तित किरण फॉक्स बिंदु देख सकते हैं
कोण बदल बदल कर किरणे डालने से बाकी स्थितियां भी समझा/समझ सकते हैं 
अब बच्चों को प्रकाश के प्रयोग व अपवर्तन और परावर्तन समझ आ गयें हैं
इस बाक्स को एक प्रभावी शिक्षण सहायक सामग्री के रूप में प्रयोग किया जा सकता है 
वैसे तो लेजर किरण भी नहीं दिखाई देती परन्तु धुंआ करने पर धूमित माध्यम में उस का मार्ग दिखाई देता है

देखें इस बाक्स के प्रयोग का यह विडियो
प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :- दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा


            

Saturday, March 03, 2012

आकाश दर्शन के प्रेमियों के लिए मार्च महीना Sky Watching in March 2012

आकाश दर्शन के प्रेमियों के लिए मार्च महीना Sky Watching in March 2012
मार्च का महीना आकाश दर्शनार्थियों के लिए बहुत बेहतरीन दृश्य प्रस्तुत करेगा
एक नहीं दो नहीं पुरे पांच पांच ग्रह, 
वो भी नग्न आँख से देखने के लिए, 
बस पहचानने के लिए नज़र चाहिए, 
कुछ आप प्रयास करो कुछ मदद हम करते हैं 
सी.वी. रमण विज्ञान क्लब के सदस्य तो माहिर हो चुके है आकाश दर्शन में, 
शुक्र,बृहस्पति,शनि,मंगल,बुध और साथ में चंदमा की अठखेलियाँ,
खास नज़ारे .....
मार्च 2010 की मंगल की तस्वीर 
3 मार्च 2012 शनिवार यानी आज रात 1 AM से 2 AM  के बीच पृथ्वी सूर्य और मंगल के बीच से गुजरेगी यह स्तिथि 4 व 5  मार्च को भी रहेगी, इन दिनों मंगल पृथ्वी के सबसे निकट होगा और अपनी चिरपरिचित लाल चमक के साथ आकाश पर विराजमान होगा मंगल का यह अद्भुद दृश्य 7 मार्च 2012 को पूर्ण चन्द्र के साथ देखने वाला होगा 
मंगल को पहचानना आसान है 
नियम वही है तारे टिमटिमाते हैं और ग्रह नहीं, 
ग्रह ऐसे लगते है जैसे कोई बल्ब दूर रौशनी फैला रहा हो, 
मंगल ग्रह की यह स्तिथि दो वर्षों के बाद आती है 
खगोलविदों की भाषा में इस घटना को अपोजिशन आफ मार्स (an opposition of Mars) कहते है 
opposition of Mars
 10 मार्च 2012 यमुनानगर 
5 मार्च 2012 को मंगल अपने कक्ष में पृथ्वी के  100 मिलियन किलोमीटर (62 लाख मील)  नजदीक होगा और जब सन् 2013 में अपनी दीर्घ वृत्तिय कक्षा में अपनी पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होगा तो इसकी चमक आज कल की चामल से 1/9 रह जायेगी  
7 - 8 मार्च 2012 को पूर्ण चंद्रमा के साथ देखा गया मंगल ग्रह अपनी लाल चमक के साथ, 
12-13 मार्च 2012 को तैयार रहें वीनस और जुपिटर यानी शुक्र और बृहस्पति अपनी अधिकतम निकटता के साथ,  


मार्च 2012 के प्रथम व दूसरे सप्ताह में लगातार वीनस और जुपिटर यानी शुक्र और बृहस्पति नजदीक आते रहेंगे, 13 मार्च को शुक्र और बृहस्पति निकटतम होंगे 
यह नज़ारा विलक्षण है 
इसलिए इसका आनंद लें 




आज 13 मार्च का दिन है और आज ये दोनों अपनी न्यूनतम दूरी पर हैं आज क्लब सदस्यों ने इस घटना का नज़ारा लिया और इसी के साथ क्लब की यह गतिविधि पूरी होती है 
वैसे तो पूरे मार्च महीने तक सदस्य आकाश पर नजर रखेंगे और अब सब को काफी आदत हो गयी है आकाश दर्शन की
आकाश दर्शन एक नियमित गतिविधि है अब सब सदस्यों को शुक्र पारगमन के लिए थोड़ा थोड़ा प्रशिक्षण दिया जाता रहेगा 
पोस्ट को अपडेट किया जाता रहेगा   
   

Tuesday, February 28, 2012

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया गया National Science Day

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया गया National Science Day 
 स्पेक्ट्रोस्कोपी से ‘रमन प्रभाव’ की खोज  
विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में हर साल २८ फरवरी को देश भर में  राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है इसलिए आज  २८ फरवरी राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विधालय अलाहर में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया गया, इस  अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया और एक विज्ञान परियोजना प्रदर्शनी लगाई गयी।
छात्रों ने इस बार की राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की मुख्य थीम ‘स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प और परमाणु सुरक्षा’ पर केंद्रित परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत की । इस अवसर पर छात्रों ने विभिन्न विज्ञान विषयों पर अपनी अपनी परियोजना प्रदर्शनी भी लगाई ।
छात्रों ने ऊर्जा के परम्परागत और गैरपरम्परागत साधनों पर चर्चा की और सोलर उर्जा, पवन उर्जा, ज्वारीय उर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों पर विचार प्रस्तुत किये। 
विज्ञान अध्यापक श्री दर्शन लाल 
विज्ञान अध्यापक श्री दर्शन लाल ने बताया कि हर साल भारत में २८ फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है इस दिन प्रख्यात भौतिकिशाष्त्री सर सी.वी.रमन ने १९२८ में स्पेक्ट्रोस्कोपी से ‘रमन प्रभाव’ की खोज की। 
मशहूर भारतीय वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन द्वारा खोजे गए रमन प्रभाव की मदद से कणों की आणविक और परमाणविक संरचना का पता लगाया जा सकता है और इसीलिए भौतिक और रासायनिक दोनों ही क्षेत्रों में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है
दररअसल रमन प्रभाव की खोज ने आइन्सटाइन के उस सिद्धांत को भी प्रमाणित कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रकाश में तरंग के साथ ही अणुओं के गुण भी कुछ हद तक पाए जाते  है। 
इससे पहले न्यूटन ने बताया था कि प्रकाश सिर्फ एक तरंग है और उसमें अणुओं के गुण नहीं पाए जाते. आइन्सटाइन ने इससे विपरीत सिद्धांत दिया और रमन प्रभाव से वह साबित हुआ ।  

 परियोजना रिपोर्ट करती छात्राएं 
इस खोज के दो साल के बाद सर सी.वी रमन को १९३० में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
इसलिए राष्ट्रीय विज्ञान दिवस, भारतीय विज्ञान और वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक महान दिन है।
विज्ञान दिवस के अवसर पर स्कूल के बच्चो को विभिन्न विज्ञान प्रयोग करके दिखाए और बच्चो ने भी अपने द्वारा तैयार ‘बेस्ट आउट आफ वेस्ट’ प्रयोग दिखा कर विज्ञान दिवस मनाने में अपना योगदान दिया।    
श्री संजय शर्मा प्रवक्ता ने नाभकीय सयंत्रों की सुरक्षा और उनसे सुरक्षित उर्जा प्राप्ती पर अपने विचार रखे ।
इस अवसर पर दिव्या,सोनम,शिल्पा,प्रियंका,मोहित,अजय,जोनी,रजत,नेहा,दीक्षा ने भी विज्ञान के विभिन्न उपविषयों पर अपने परियोजना पेपर पढ़े ।
मुकेश रोहिल,मनोहरलाल,दर्शन लाल, राम नाथ बंसल,संदीप अध्यापकों का योगदान सराहनीय रहा ।

प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :- दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा