Wednesday, December 05, 2012

देहरादून में सम्पन्न विपनेट क्लबों का क्षेत्रीय मिलन Regional Vipnet Meet Dehradun

देहरादून में सम्पन्न विपनेट क्लबों का क्षेत्रीय मिलन Regional Vipnet Meet Dehradun
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लंबे समय से प्रतीक्षातीत विपनेट क्लबों का क्षेत्रीय मिलन कार्यक्रम व कार्यशाला देहरादून के नवनिर्मित दून विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुआ।  29 नवम्बर से 1 दिसम्बर 2012 तक चलने वाला यह कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ विपनेट विज्ञान क्लबों में एक नयी ऊर्जा के संचार का स्रोत बना। उतराखंड की राजधानी देहरादून में कार्यरत एन. जी. ओ. स्पेक्स (Specs, Society of Pollution & Environmental Conservation Scientists), यूकोस्ट (विज्ञान और प्रोद्योगिकी विभाग उत्तराखंड) उत्तराखंड सरकार और विज्ञान प्रसार भारत सरकार के सयुंक्त तत्वाधान में दून विश्वविद्यालय केदार पुरम देहरादून में इस क्षेत्रीय विपनेट मीट में सात उत्तरी राज्यों जे. एंड के., हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व बिहार के चुनींदा सक्रिय विज्ञान क्लबों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
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    दून विश्वविद्यालय के FRI जैसे नवनिर्मित  भवन व विश्वस्तरीय फेकल्टी गेस्ट हाउस ने   सभी प्रतिभागियों को आकर्षित किया।
29 नवम्बर को कांफ्रेंस हाल में इस कार्यक्रम का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन सत्र में वि. वि. के कुलपति श्री वी. के. जैन व यूकोस्ट के निदेशक श्री डा. राजिंदर दाभोल जी ने सम्बोधित किया और विज्ञान जागरूकता के सूक्ष्म पहलूओं से प्रतिभागियों को अवगत करवाया।
तकनीकी सत्र में विज्ञान प्रसार के वैज्ञानिक डा. श्री आर. के. उपाध्याय ने विस्तार से भारत में कार्यरत विज्ञान क्लबों के बारे में बताया और आंकड़ों के द्वारा प्रमाणित भी किया। उन्होंने विज्ञान संचार में विज्ञान क्लबों की भूमिका और प्राप्त परिणामों का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया यह विश्लेषण गत वर्षों के आंकड़ों पर आधारित था। क्लब प्रतिनिधियों के लिए यह जानकारी बहुत खुशगवार थी कि उन की गतिविधियों को व उनके क्लबों द्वारा भेजी गयी छोटी से छोटी रिपोर्ट को भी विज्ञान प्रसार ने इन आंकड़ों में शामिल किया। नयी ऊर्जा का संचार करती यह रिपोर्ट अपने लक्ष्य को प्राप्त कर गयी।
डा. डी. एस. पुंडीर जी ने संचार की उम्दा व्याख्या की और संचार के विभिन्न तरीकों को सउदाहरण समझाया। संचार के सबसे उत्तम तरीके को अपनाने का प्रशिक्षण दिया व बताया कि आपकी बात जनसामान्य तक तभी कारगर तरीके से पहुँच सकती है जब वो बात उन के हितों को सपष्ट करती हो अन्यथा आपके बोलते रहने से और उनके सुनने से कोई सकरात्मक परिणाम सामने नहीं आ सकते।
स्पेक्स के महत्वपूर्ण नवाचार LED व बांस की जुगलबंदी रोजगार के नए अवसर पैदा करती है इनसे प्रशिक्षण प्राप्त कर के इस कला को व्यवसाय के रूप में अपना कर कोई भी शिक्षित या अशिक्षित अपनी रोजीरोटी कमा सकता है। स्पेक्स के इस नवाचार को सभी ने सराहा और कईं प्रतिभागियों ने उनसे यह LED लैम्प ख़रीदे भी।
रामपुर से आये श्री राशिद शमशी जी ने अपने नवाचारी माडल दिखाए और खूब वाहवाही लूटी।
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श्री बी. के. त्यागी
कार्यशाला के दूसरे दिन विज्ञान प्रसार के वरिष्ठ वैज्ञानिक श्री बी. के. त्यागी ने प्रशिक्षण की कमान संभाली। श्री बी. के. त्यागी ने बताया कि विज्ञान क्लब देश भर में अपना कार्य बखूबी कर रहें हैं परन्तु फिर भी बहुत कुछ है जो कि अभी होना बाकी है इतना विशाल नेटवर्क बनना चाहिए कि उत्तर के एक एक क्लब गातिविधि  की जानकारी दक्षिण पूर्व व पश्चिम के क्लबों को भी होनी चाहिए। श्री त्यागी जी ने निम्न बिंदुओं को गहनता से उठाया।
* देश भर में विज्ञान क्लबों की गतिविधियों में समरूपता नहीं है। हालांकि यह एक गम्भीर मुद्दा नहीं हैं परन्तु फिर भी गतिविधियों में समरूपता अपरिहार्य है।
* क्लबों की मौजूदा गतिविधियों का कोई सामाजिक महत्त्व नहीं है यह तथ्य अधिक सपष्ट नहीं पाया परन्तु श्रोताओं में खुसर फुसर थी कि उनके क्लबों ने शुक्र पारगमन को जन सामान्य तक पहुंचाया है और इससे गातिविधि का सामाजिक महत्व सपष्ट है परन्तु हो सकता है कि समग्र रूप से कही गयी यह बात सत्य हो कि कुछ गतिविधियां समाज के लिए लाभदायक ना हो।
* क्लब विज्ञान जागरूकता को ग्रास रूट लेवल तक पहुंचा पाने में समर्थ नहीं हो पा रहे हैं।
* क्लब का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि क्लब स्थानीय स्तर पर नवाचार को खोजे और उस को प्रचारित करे और सही मुकाम तक पहुंचाने का सेतु बने।
यहां यह बात समझ आती है कि कोई आम आदमी या बालक कोई नवाचार खोजता है या कोई ऐसी मशीन या विधि विकसित करता है जो चाहे जुगाड़ की श्रेणी में आती हो परन्तु उस से ऊर्जा समय या धन की बचत होती ऐसी खोज को उसके सही मुकाम तक पहुंचाने में क्लब की विशेष भूमिका होनी चाहिए।
* हर एक क्लब का अपना प्रश्न बैंक होना चाहिए जिसमे एप्लीकेशन आधारित प्रश्नों व उनके उत्तरों का संग्रह होना चाहिए।
* जिले में एक या अधिक क्लब 60 से 70 क्लबों का गठन करें और उन का पोषण करें।
* बहुत से क्लब यहां वहाँ की गतिविधियां कर रहे हैं जिनका कोई सोशल इम्पोर्टेंस नहीं है अधिकाँश क्लब तो बस दिवस ही मनाने में लगें हैं दिवस जरूर मनाए जायें परन्तु अधिकाँश गतिविधियां परिणामउत्पादक व क्लब के लिए आत्मनिर्भरतापरक भी हों।
* श्री त्यागी जी ने 12 क्षेत्र निर्धारित किये जिन के अंतर्गत गतिविधियां करवाई जानी हैं उर्जा, जमीन व लोग, नवाचार, मिलावट, जल, फ्रंटियर साइंस आदि बताए गए।
* श्री त्यागी जी ने क्लब की गतिविधियों के प्रलेखन documentation पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा क्यूँकी किसी भी गातिविधि और तथ्य की प्रमाणिक जानकारी का प्रलेखन भविष्य के लिए एविडेंस मना जाता है।
* भविष्य में सभी क्लब एक स्थानीय जैव विविधता रजिस्टर लगायेंगें जिस में क्लब के सदस्य स्थानीय जैव विविधता का रिकार्ड रखेंगें इससे आगामी वर्षों में जैव अजैव स्तरों पर आने वाले परिवर्तनों और उन के समाधान का हल निकालने में आसानी होगी।
सभी राज्यों से आये क्लब प्रतिनिधियों को निम्न कार्य योजना बनाने के लिए समूहों में बैठाया गया।
1. सभी राज्य पूरे साल की 12 महीनों की गतिविधियां लिख कर दें जो वो वर्ष भर में करवायेंगें।
2. नवाचारी गतिविधियां व कार्यशालाएं सुझाएँ या मांग करें जो वो भविष्य में चाहते हैं।
3. सभी प्रतिभागी फीडबेक फ़ार्म को भी पूरा करते चलें।
पोस्टर प्रदर्शनी
आज ही एक पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गयी जिस में सभी राज्यों से आये क्लब प्रतिनिधियों ने अपनी अपनी गतिविधियों को दर्शाती पोस्टर प्रदर्शनी लगाई। पोस्टर पर क्लब गतिविधियां लिखी गयी थी साथ ही में उस के चित्र भी लगये गए थे और किसी किसी क्लब ने स्थानीय अखबारों की कतरने भी लगाई थी। क्लब प्रतिनिधियों ने पोस्टर बनाने में बहुत मेहनत की हुई थी इन पोस्टर्स को देख कर सभी क्लब प्रतिनिधि एक दूसरे द्वारा करवाई गयी गतिविधियों के बारे में जान रहे थे     
FRI फोरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का भ्रमण करवाया गया जहां प्रतिभागियों ने वन और जैव विविधता के बारे में जाना। यहां सभी प्रतिभागियों को मशरूम उगाने बारे व्याख्यान दिया गया व मशरूम कृषि का ज्ञान दिया गया। सभी प्रतिभागी FRI के संग्राहलय देख कर प्रसन्न हो रहे थे क्यूंकि यहां इतना ज्ञान भरा पड़ा था। वे भविष्य में क्लब सदस्यों को यहां लाने का प्लान बनाते भी दिखे।
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FRI
FRI स्वतन्त्रता पूर्व बनायी गयी थे जिस का उद्देश्य हिमालयाई वनस्पतियों व जैव विविधता का अध्ययन करना था।
विज्ञान प्रसार की तरफ से सभी क्लब प्रतिनिधियों को बेहतरीन पुस्तकों के सेट और सालिम अली की हिंदी अनुवादित शोधपरक पुस्तक भारत के पक्षी व वार्षिक गणित टेबल कैलेंडर भी भेंट किया गये।

दर्शन लाल बवेजा
यमुनानगर हरियाणा से राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय अलाहर के विज्ञान अध्यापक व सी. वी. रमन विज्ञान क्लब के प्रभारी दर्शन लाल बवेजा ने चायपान के बाद क्लब गतिविधियों के प्रलेखन की हस्तलिखित विधि,  कम्प्यूटर टंकण विधि व विज्ञान चिट्ठाकारी विधि के नमूने दिखाए।
अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने विज्ञान संचार में साइंस ब्लोगिंग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार क्लब अपनी गातिविधि का  ग्लोबल प्रचार ब्लोगिंग के माध्यम से कर सकता है उन्होंने प्रोजेक्टर से सी. वी. रमण विज्ञान क्लब के ब्लॉग www.sciencedarshan.in का भी भ्रमण करवाया, श्री त्यागी जी ने भविष्य में विज्ञान ब्लागिंग कार्यशाला लगाने की भी घोषणा की। श्री दर्शन बवेजा ने आभासी डाक टिकेट संग्रह रूचि विकसित करने के बारे में बताया और क्लब सदस्यों के द्वारा फिलेटली की तैयार फ़ाइल को भी सभी को दिखाया।
तत्पश्चात श्री त्यागी जी ने विज्ञान प्रसार पोर्टल का भ्रमण करवाया और विस्तार से इस पोर्टल का लाभ लेना सिखाया व प्रतिभागियों को online क्लब गातिविधि रिपोर्ट सबमिट करना भी सिखया गया।
तत्पश्चात श्री त्यागी जी ने विज्ञान प्रसार पोर्टल का भ्रमण करवाया और विस्तार से इस पोर्टल का लाभ लेना सिखाया व प्रतिभागियों को online क्लब गातिविधि रिपोर्ट सबमिट करना भी सिखाया गया।
श्री ब्रजमोहन शर्मा
कार्यशाला के तीसरे व अंतिम दिन श्री योगेश भट्ट ने प्रतिभागियों की खास मांग पर ‘रसोई कसौटी किट’ का प्रदर्शन किया। यह किट ‘स्पैक्स’ संस्था के श्री ब्रजमोहन शर्मा जी ने साथियों के सहयोग से विकसित की है उन्होंने 100-500 रुपए में सस्ता ‘रसोई कसौटी किट’ तैयार किया है। इस किट से रसोई में प्रयोग होने वाली, लगभग 45 खाद्य वस्तुओं की शुद्धता की जाँच की जा सकती है। इस किट को भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मान्यता देकर देश के प्रत्येक जिले के लिए तैयार करवाया है। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने एक अभियान के तहत उत्तराखंड समेत देश के कई हिस्सों में मिलावटखोरी यानि एडलटरेशन की जाँच की तथा लोगों को भी खुद जाँच करना सिखलाने के लिए इस किट को विकसित किया है इस किट से कोई भी मिलावटखोरी यानि एडलटरेशन की जाँच कर सकता है। स्पेक्स के सचिव डॉ. बृजमोहन शर्मा बताते हैं कि इन मिलावटी तत्वों से जोड़ों का दर्द, हैजा, पेट का दर्द, लीवर, अलसर, उलटी, कैंसर, ड्रापसी, पेट की गैस, सूजन, ग्लूकोना, श्वास रोग, पेचिश, लकवा, न्यूरोटाक्सिक, एलर्जी, बाल झड़ना, बाल सफेद होना तथा त्वचा रोग होने की सम्भावना होती है। खाद्य पदार्थों में मिलावट एक जघन्य अपराध है जो कि लोगों के जीवन को दांव पर लगा रहा है। उत्तराखण्ड में पर्यटन मुख्य व्यवसाय है, प्रत्येक वर्ष देश-विदेश से लोग यहाँ आते हैं, परन्तु इस तरह की मिलावट यहाँ की छवि को खराब करता है।
डाक्टर श्रीमती सरिता खंडका जी जो कि युकोस्ट में वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी हैं ने खगोलीय टेलीस्कोप के बारे में विस्तार से बताया और जलपान के दौरान सब की जिज्ञासाओं को शांत किया।
भूगर्भ विज्ञान विभाग से आयीं वैज्ञानिक डा. आरती काकरी ने भूकम्प के सामन्य ज्ञान से सभी प्रतिभागियों को परिचित करवाया। उन्होंने बहुत ही सरल भाषा में प्रतिभागियों को भूकम्प के कारण व बचाव के तरीकों से अवगत कराया। यह प्रशिक्षण सभी प्रतिभागियों को बहुत प्रभावित कर गया।
श्री सतीश कौशिक जी ने बताया कि कैसे मनुष्य बिना मिट्टी व सूरज की रोशनी के पौधे उगा सकता है। इस विधि का नाम है जल कृषि यानि कि हाइड्रोपोनिक्स, विज्ञान की दुनिया में यह कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन आम आदमी इस बात को दूर की कौड़ी मान बैठता है। इसके लिए उन्होंने संस्था द्वारा तैयार किया हुआ ब्लूम विलयन दिखाया, यदि एक लीटर पानी में 29 बूँदें ब्लूम सॉल्यूशन की डालें तो उस पानी में कोई भी पौधा जडें व तने उगने लगेगा। जल कृषि में एक पौधा उगाने का खर्चा मात्र 4 रुपए सालाना है। जबकि, एक प्लास्टिक का नकली पौधा कम से कम 100-150 रुपए में मिलता है। प्लास्टिक के बेकार पौधों की बजाय, हाइडोपॉनिक पौधों में आपको व आपके बच्चों को हर रोज, नई जड़ें व नई कोपलें फूटते दिखाई देंगी। स्पेक्स का यह प्रशिक्षण सभी प्रतिभागियों को बहुत आकर्षित करता दिखा।
बागपत से आये क्लब प्रतिनिधि ने अपनी 120 गतिविधियों का संग्रह दिखाया तो देवरिया के अतुल श्रीवास्तव ने पानी से चलने वाले स्टोव की जानकारी देकर सब को आश्चर्यचकित कर दिया उन्होंने सबसे छोटा चाप लगाने का भी दावा किया।
मेरठ से संगीता, बुलंद शहर के मास्टर विभु मित्तल, बन्दा के शनि कुमार, लखनऊ से अरुण कुमार, अल्मोडा से हेमंत, मलोट पंजाब से सुनील कुमार व बिजनोर से शलभ गुप्ता जी का उत्साह देखते ही बनता था।
एक शख्शियत जो सबसे अधिक प्रभावित कर गयी वे थे हाँजहांपुर से डाक्टर इरफ़ान ह्यूमन, उन से बहुत से विज्ञान संचार मुद्दों पर बातचीत हुई।
इरफ़ान जी ने विज्ञान संचार पर अपने नज़रिए से सभी प्रतिभागियों को अवगत करवाया  
समापन समारोह से पूर्व पंजाब, जम्मू कश्मीर व यू. पी. के प्रतिनिधियों ने टेक्निकल रिपोर्ट पढ़ी बाकी राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपनी रिपोर्ट जमा करवाई फीडबेक फ़ार्म व वार्षिक गातिविधि कैलेंडर जमा करवाया।
सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र देकर व पुस्तके देकर सम्मानित किया गया
अत्याधिक उत्साह से भर कर सभी प्रतिभागी विज्ञान संचार की नयी मुहीम शरू करने अपने अपने घरों को गए फिर मिलने का वायदा करके।
प्रस्तुति: सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर, हरियाणा
द्वारा: दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर, हरियाणा


 



 

Sunday, November 04, 2012

आभासी डाक टिकेट संग्रह Virtual Postage Stamps collection

आभासी डाक टिकेट संग्रह Virtual Postage Stamps collection

आभासी डाक-टिकट संग्रहिकीः वैज्ञानिक जन-समुदाय हेतु एक नवीन उपकरण
कभी-कभी जब आपको कोई पत्र मिलता है तो उस पर चिपकी डाक टिकट पर आपका ध्यान यका-यक चला जाता है, और हो सकता है आप उस डाक टिकट का संग्रह भी कर लें। ऐसा आपके साथ ही नहीं होता, बल्कि अधिकांश डाक टिकट प्रेमी लोगों के साथ ऐसा ही हेाता है। शायद तभी डाक-संग्रह की विधा का एक शौक के रूप में विकास हुआ होगा। आज डाक-टिकट संग्रहिकी हर उम्र के लोगों का एक ऐसा शौक है जो न केवल खाली समय को रचनात्मक तरीके से गुजारने, नये दोस्त बनाने तथा किसी देश के इतिहास, सांस्कृति, पेड़-पौधे, जीव जन्तुओं आदि को जानने व पहचानने का अच्छा माध्यम हैं। इसके अलावा आप अगर कला के क्षेत्र में भी शौक रखते हैं तो आपकी रचनात्मकता को एक नई दिशा देने के लिए यह गतिविधि एक नया आयाम देगी। शायद इन्हीं कारणों से इस शौक को सभी गतिविधियों का बादशाह कहा जाता है।
डाक-टिकट संग्रहिकी जिसे अंग्रेजी में फिलेतली (Philately) कहते हैं, यह एक फ्रैंच शब्द का अंग्रेजीकरण है जिसे 1864 में जॉर्ज हरपिन ने गढ़ा था। डाक संग्रह आज एक शौक के रुप में महत्वपूर्ण विधा है जो आज केवल डाक-टिकट एकत्र करने व डाक का इतिहास जानने तक ही समिति नहीं है। आज यह एक व्यापार का रूप भी ले चुकी है। पुराने समय के राजा-महाराजा कई चुनिंदा व दुर्लभ डाक-टिकटों को मुँह मांगे दाम देकर अपने व्यक्तिगत संग्रह में रखना अपनी शान समझते थे। आज डाक-टिकट संग्रहिकी शौक के अलावा पूर्ण विषय का रुप ले चुकी है और जिसमें शामिल है डाक-टिकटें, उसके डिजाइन, उपयोग हुए कागज, प्रिंटिंग का तरीका, चिपकाने के लिए लगाए गोंद आदि। आज यह आवश्यक नहीं है कि मंहगी व दुलर्भ टिकट आपके पास हो, किसी अजायबघर में भी जाकर आप शौक पूरा कर सकते हैं।
समय के साथ-साथ यह शौक कुछ महंगा हुआ और शायद मनोरंजन के अन्य साधन उपलब्ध होने के कारण, लोगों के इस शौक में कुछ कमी आई। परन्तु इन्टरनेट और वेव (वर्ल्ड वाइड वेव) के आने और उसके फैलाव से अब यह शौक पुनः एक नये अवतार के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। जैसे कि आप सभी जानते हैं इन्टरनेट नया व आधुनिक माध्यम है। आंकड़े प्रविष्ट करने, आंकड़ो तथा दस्तावेजी फाइलों की खोज, ई-मेल, चैट समाचार, रोजगार की तलाश, उत्पादन, सूचना, नेट सर्फिंग, मनोरंजन, प्रतियोगिता, रेल एवं हवाई टिकट, सॉफ्टवेयर तथा गेम डाउनलोड इत्यादि-इत्यादि
इन सबसे के लिए इन्टरनेट एक आवश्यक प्रौद्योगिकी है। यहां यह जान लेना आवश्यक है कि इन्टरनेट स्वयं कोई जानकारी या सूचना नहीं हेाती बल्कि इन्टरनेट सभी उपयुक्त व और भी अनेक सेवाएं जैसे वैव (वल्र्ड वाइल्ड वेव www) का हिस्सा है। वेव दस्तावेजों को खोजने, तस्वीरों, एनिमेशन तथा विडियों को देखने, श्रव्य फाइलों को सुनने, बोलने ओर बोली हुई आवाज सुनने और दुनिया में किसी भी सॉफ्टवेयर पर चलने वाले कार्यक्रमों को देखने में हमारी मदद करता है। बशर्ते हमारे कम्प्यूटर में इन सब सेवाओं को पाने के लिए जरूरी हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर उपलब्ध हों। सन् 1992 में जहां इन्टरनेट का उपयोग करने वालो की संख्या कुछ हजारों में थी आज वह संख्या अरब में हो चुकी है। यानि अब हम इतने लोगों से प्रत्यक्ष रूप से आपस में जुड़ सकते हैं। आज हम विभिन्न वेव सर्वर पर बहुत-सी जानकारियों को खोज सकते हैं, उन्हें डाउनलोड कर सकते हैं ओर अपने दोस्तों व साथियों के साथ बांट सकते हैं।
इन्टरनेट के इस सूचना क्रांति ने डाक टिकट संग्रहिकी को एक नये रूप् में जन्म दिया है, जिसे आभासी डाक संग्रहिकी कहते हैं। आभासी डाक संग्रहिकी ने आज हमें बिना लागत या कम लागत की विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए एक नया माध्यम उपलब्ध करवाया है।
आओ इसके बारे में कुछ ओर जाने तथा किस प्रकार इस विधा को विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए उपयोग किया जा सकता है। 
आज दुनिया के कई देशों में आभासी डाक संग्रहण विषय पर कई क्लब, वेव साइट व कम्यूनिटी उपलब्ध हैं। आप चाहे तो स्वयं भी उनके सदस्य या हिस्सा बन सकते हैं या अपनी कम्यूनिटी बना सकते हैं।
आभासी डाक-टिकट संग्रहिकीः वैज्ञानिक जन-समुदाय हेतु एक नवीन उपकरण
आभासी डाक-टिकट संग्रहिकीः (Virtual Philately) डाक टिकटे एकत्र करने की एक नवीन रोमांचक तथा अल्प-कीमत विधि तथा दुनिया का सबसे अधिक लोकप्रिय एवं शिक्षाप्रद शौक बनता जा रहा है।
डाक-टिकट एकत्र करने की आधुनिक विधि में भौतिक रूप में असली डाक-टिकट एकत्र करने की बजाय डाक-टिकटों की तस्वीरें, जो असंख्य फिलेतली वेबसाइट्स पर निशुल्क उपलब्ध हैं, कॉपी और पेस्ट की जाती है। इन तस्वीरों का प्रयोग करते हुए कोई भी अपना डाक-टिकट संग्रह बना सकता है तथा इनको शीट के ऊपर व्यवस्थित कर बिल्कुल वास्तविक डाक-टिकटों की तरह प्रदर्शित कर सकता है।  अगर आप चाहें तो आभासी डाक टिकट संग्रहण प्रदर्शनियों में भी भाग ले सकते हैं।
अगर आपके पास या स्कूल के विज्ञान क्लब में इन्टरनेट युक्त कम्प्यूटर या लैपटॉप है और इस शौक में आप रुचि रखते हैं, तो आप आसानी से इस शौक का आनन्द ले सकते हैं।
आभासी डाक-टिकट संग्रहिकी के लाभ
1. दुनिया के किसी भी देश में मनपंसद डाक-टिकट माऊस के एक क्लिक मात्र से तुरंत प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करती है।
2. व्यक्ति की रूचि में सहजता से विविधता उत्पन्न करती है क्योंकि यह डाक-टिकट संग्रहण के थीम व विषयों के अनंत विकल्प प्रदान करती है।
3. बाजार से डाक-टिकट खरीदने और ढूंढने मे लगने वाले धन और समय की बचत करती है।
4. वास्तविक डाक-टिकटों को संभाल कर रखने में अपेक्षित सावधानी को भी कम करती है।
5. कोई भी व्यक्ति दुर्लभतम् तथा सबसे महंगी डाक-टिकटे देख व प्राप्त कर सकता है।
6. वास्तविक डाक-टिकटों के संग्रहण की समस्या से निजात दिलाती है।
7. कोई भी व्यक्ति किसी भी समय एक सीडी की सहायता से यह संग्रह देख सकता है।
8. बाजार से डाक-टिकट खरीदने और ढूंढने मे लगने वाले धन और समय की बचत करती है।
9. यह डाक-टिकट के बारे में सही पहचान तथा ज्ञान द्वारा उत्कृष्ट ज्ञानार्जन अवसर तथा शैक्षिक मूल्य प्रदान करता है।
10. यह वर्गीकरण और व्यवस्थापन के वैज्ञानिक कौशल सीखने में सहायता करती है।
11. यह खुशी और आनंद के साथ दुनिया भर से ज्ञानार्जन हेतु मूल्यवान संसाधन उपलब्ध कराती है।
12. यह विश्वभर के आभासी डाक-टिकट संग्रहक समुदाय का हिस्सा बनने व उनसे परस्पर-संवाद विकसित करने के अवसर प्रदान करती है।
13. यह अंतर-विद्यालयी फिलेटेली प्रदशर्नियों जैसे जयपुर में हुई स्कूलपलेक्स के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय आभासी फिलेटेली प्रदशिर्नियां (एक्सपेनेट) में भाग लेने का भी अवसर प्रदान करती है।
14. चूंकि डाक-टिकट संग्रहण को अब केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा प्रोजेक्ट के रूप में मान्यता दे दी गई है, इसलिए आभासी संग्रहण को प्रोजेक्ट कार्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
आभासी डाक टिकट संग्रह कैसे करें
आभासी टिकट संग्रह की थीम या विषय सूचि
यदि कोई व्यक्ति आभासी टिकट संग्रह करना चाहे और इसके लिए तैयार हो तो लिखने के लिए एक नोटबुक, पेन और उपरोक्त दिशानिर्देश पुस्तिका लेकर इंटरनेट से जुड़े कम्प्यूटर पर बैठ जाए तथा निम्नलिखित सर्वप्रथम अपनी रुचि के विषय, जिस पर आप डाक-टिकट का संग्रह करना चाहते हैं, को लिखे (आप बाएं चित्र में दिए विषयों में से भी चुन सकते हैं)
अब कम्प्यूटर को स्विच आन कर इंटरनेट से जोड़े। कोई भी सर्च इंजिन जैसे गूगल इत्यादि खोले और इसमें टाइप करें टोपिकल फिलाटेली अथवा फिलाटेली (Philately) से संबंधित अन्य कोई लिंक खोले और सर्च करें।
इस साइट के पेज खोलें तथा वांछित डाक-टिकटों की तस्वीरों को कॉपी करें और एक नए फोल्डर में इनको सुरक्षित (सेव) करें। तथा इनको अपने थीम का नाम दें।
सेव की गई तस्वीरों का संक्षिप्त विवरण कॉपी करें अथवा लिखें, यदि विवरण वैबसाइट पर दिया गया हो तो ठीक है अन्यथा अन्य वैबसाइटों से ढूंढे।
विभिन्न लिंक से लगभग 120-140 डाक टिकटों (अपने थीम से संबंधित) को सेव करें।
अब एक बार फिर से कागज और पेन का प्रयोग करते हुए अपने थीम पर, जिस पर आभासी डाक-टिकट संग्रह तैयार करना, संक्षिप्त प्रस्तावना लिखें।
आभासी संग्रह के लिए हमेशा सफेद पृष्ठभूमि में ए-4 आकार की खड़ी (उर्ध्वाधर) शीट का प्रयोग करें।
पृष्ठ संख्या 1
गणितज्ञ थीम के अंतर्गत आपका पेज ऐसा दिखेगा
अब एक योजना अथवा प्रस्तावना पृष्ठ तैयार कीजिए। 16 साइज के फोंट में काले रंग का प्रयोग करते हुए थीम का शीर्षक लिखें। थीम का संक्षिप्त परिचय लिखे, जिसके लिए 20-25 पंक्तियां नोट की गई थी। काले रंग के अलावा अन्य कोई रंग प्रयोग न करें। यह पृष्ठ संख्या 1 कहलायेगी।
योजना अथवा प्रस्तावना पृष्ठ में संक्षिप्त प्रस्तावना लिखने के पश्चात् जो जगह बचती है उसमें एम एस वर्ड की सहायता से एक टेबल सारणीबनाएं। इस सारणी में पृष्ठवार उपशीर्षक तथा प्रत्येक पृष्ठ पर प्रदर्शित तस्वीरों की संख्या एवं उपशीर्षकों के विवरण भरें।
प्रत्येक ए-4 आकार के पृष्ठ (शीट) पर चारों तरफ कुछ हाशिया छोड़ते हुए एमएसवर्ड की सहायता से (3 गुना 3) वर्गाकार अथवा आयताकार सारणी तैयार करें।
गणितज्ञ थीम के अंतर्गत आपका पेज ऐसा दिखेगा
भिन्न-भिन्न शीट हेतु अलग-अलग शीर्षक तैयार करें, लेकिन एक फ्रेम में 16 से अधिक न हों।
अब सुरक्षित रखी गई (सेव) तस्वीरों वाले थीम के फोल्डर को खोलें, उनके थम्बनोल दृश्य को देखें तथा विभिन्न शीट में बनाए गए वर्गों अथवा आयतों में लिखे शीर्षकों के अनुसार इन तस्वीरों को एक-एक कॉपी-पेस्ट करें। प्रत्येक वर्ग अथवा आयत में डाक-टिकट तस्वीर के नीचे उसका संक्षिप्त विवरण पहले बताए अनुसार काले रंग से लिखें। अक्षरों के फोंट का आकार विवरण हेतु 12 तथा उप-शीर्षक हेतु 14 होना चाहिए।
याद रहे कि संग्रह के एक पृष्ठ में सामान्यतया 8-10 डाक-टिकट तस्वीरों से अधिक न हो, अन्यथा पृष्ठ भरा-भरा दिखेगा। मूल डाक-टिकटों के आकार में तस्वीरें न डाली जाएं, अन्यथा यह जालसाजी (नकल) मानी जाएगी। यदि संभव हो तो प्रथम मुख्य पृष्ठ तथा लघु आकार शीट थीम से संबंधित एक या दो तस्वीरें कॉपी करें तथा इनको उपयुक्त शीट पर पेस्ट करें। इससे संग्रह में फिलेटेली के वास्तविक गुणों का एहसास होगा।
अन्य शीट (पृष्ठों) की अनुक्रम संख्या लिखें। योजना अथवा प्रस्तावना पृष्ठ के सबसे नीचे दाई और कोने में अपना नाम, कक्षा एवं क्लब का नाम लिखें। अंततः प्रत्येक पृष्ठ का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें तथा यदि कोई त्रुटि हो उसे ठीक करें। संग्रह को सुरक्षित (सेव) करें। दो सी.डी. (कॉम्पेक्ट डिस्क) एक प्रदर्शनी या किसी प्रतियोगिता के लिए दूसरी को संदर्भ हेत मास्टर कॉपी के तौर पर तैयार की जाए। इस तरह कोई भी इस संग्रह का पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन भी (बिना अधिक श्रम के) तैयार कर सकता है।
यहाँ से डाक टिकट कोपी-पेस्ट करें 
साभार बी. कु. त्यागी (वैज्ञानिक)
Shri B.K.Tyagi
Scientist- D
यहाँ पर प्रकाशन दर्शन लाल बवेजा सी वी रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर हरियाणा