Monday, September 23, 2013

खगोल-विज्ञान जागरूकता अभियान Astronomy Awareness campaign

खगोल-विज्ञान जागरूकता अभियान Astronomy Awareness campaign 
खगोल-विज्ञान जागरूकता कार्यक्रम 
सी वी रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर ने स्थानीय मुकुंद लाल पब्लिक स्कूल सरोजिनी कालोनी मे अंतरिक्ष विज्ञान संचार कार्यक्रम के अंतर्गत खगोल-विज्ञान जागरूकता कार्यक्रम की शुरुवात की। इस कार्यक्रम मे क्लब सदस्यों व अध्यापकों को विभिन्न पूर्व व भविष्य मे होने वाली खगोलीय घटनाओं से अवगत करवाया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमति शशि बाठला ने किया। क्लब प्रभारी व विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल बवेजा ने विद्यार्थियों को  कार्यक्रम में इरैटोस्थनीज प्रयोग, उन्नयन कोण, त्रिकोणमितीय गणनाओं, सूर्यकोण मापन, न्यूनतम परछायी प्रेक्षण, अक्षांशीय व देशान्तर रेखाओं की स्थिति,
नवम्बर मे दृश्यमान होने वाला आइसोन धूमकेतू 
नवम्बर मे दृश्यमान होने वाले आइसोन धूमकेतू अवलोकन, अक्टूबर मे घटित होने वाले चन्द्र ग्रहण अवलोकन आदि की सैद्धान्तिक व प्रायोगिक जानकारियां  दी गई।
आज है शरद विषुव पर होंगे दिन व रात बराबर
शरदकालिक विषुव प्रस्तुति 

शरदकालिक विषुव तेईस सितम्बर यानि कि आज का दिन एक खास विशेषता रखता है कि आज दिन व रात की अवधि बराबर होगी। विषुव एक खगोलीय घटना है जो साल मे दो बार होती है मार्च मे वसंत विषुव और सितम्बर मे शरद विषुव या शरद सम्पत होता है ये दो सम्पात संक्रान्तियाँ कहलाती हैं। स्थानीय मुकुंद लाल पब्लिक स्कूल सरोजिनी कालोनी मे सी वी रमण विज्ञान क्लब सदस्यों को ऐसी जानकारी देते हुए विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल बवेजा ने कहा कि प्रत्येक वर्ष चार बार ऐसी स्थितियां आती हैं जब सूर्य भूमध्य रेखा, कर्क रेखा और मकर रेखा पर होता है तब क्रमश मार्च विषुव, जून अयनांत, सितम्बर विषुव, दिसम्बर अयनांत चार सूर्य स्तिथियां बनती है। इस बार तेइस सितम्बर यानि आज शरद विषुव को सूर्य भूमध्य रेखा पर होगा और यदि कोई व्यक्ति भूमध्य रेखा पर खड़ा हो तो सूर्य उसे सीधे अपने सिर के ऊपर दिखाई देगा और एक निश्चित समय पर उस  की परछाई शून्य हो जायेगी। इसका यह भी अर्थ है कि आधा ग्रह पूरी तरह प्रकाशित होता है और इस समय दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।
कहाँ कहाँ से गुजरती है भूमध्य रेखा 
भूमध्य रेखा चौदह देशों मे से स्थल या जल से होकर जाती है। पृथ्वी की सतह पर अधिकतर भूमध्य रेखीय क्षेत्र समुद्रीय ही है। भूमध्य रेखा के आस-पास के स्थान अंतरिक्ष केंद्र की स्थापना के लिए अच्छे होते हैं गुयाना अंतरिक्ष केंद्र, कौरोऊ व  फ्रेंच गुयाना का अंतरिक्ष केंद्र भी भूमध्य रेखा पर ही स्थित है। कीनिया गणतंत्र पूर्वी अफ्रीका में भूमध्य रेखा पर स्थित है। इक्वाडोर देश भूमध्य रेखा पर है  जिसके आधार पर ही इस देश का नाम इक्वाडोर रखा गया है  भूमध्य रेखा इक्वाडोर को दो भागों में विभाजित करती है। इसकी राजधानी क्विटो और सबसे बड़ा शहर गुआयाकिल है।
क्यूं होता है ऐसा ? 
सूर्य अपनी सामयिक चाल में आकाश से वर्ष में दो बार इक्कीस मार्च और तेइस सितंबर को भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर से गुजरता है। इन दिनों भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें पृथ्वी की सतह के एकदम लम्बवत पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर स्थित प्रदेशों में सूर्योदय और सूर्यास्त अपेक्षाकृत अधिक देर से होता है। ऐसे स्थानों पर वर्ष भर सैद्धांतिक रूप से बारह  घंटों के दिन और रात होते हैं।
क्या होता है इस कारण?
शरद विषुव से मौसम मे बदलाव के असर दिखाई देने लग जाते हैं इस दिन से भूमध्य रेखा के  उत्तर में दिन छोटे और रात लंबी होती हैं जो शीतकाल की शुरुआत का संकेत है और इसके उल्ट भूमध्य रेखा के  दक्षिण में दिन लंबे व रातें छोटी होती हैं जो ग्रीष्मकाल की शुरुआत का संकेत है। भूमध्य रेखा के दोनों और के गोलार्धों में मौसम एकदम उलटे होते हैं। किंतु भूमध्य रेखा पर दिनमान के साथ साथ मौसम भी लगभग समान ही रहता है।
 पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग
क्लब सदस्यों ने किया पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग
शरद विषुव के अवसर का लाभ उठाते हुए क्लब सदस्यों व स्कूल के विद्यार्थियों ने अपना चिर परिचित पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग भी किया। इस  प्रयोग मे बच्चो ने दर्शन लाल विज्ञान अध्यापक के मार्गदर्शन मे इस प्रयोग से समबन्धित प्रेक्षण लिए व आवश्यक गणना की व पृथ्वी की परिधि ज्ञात की। उन्होंने बताया कि क्लब पृथ्वी की परिधि नापने के प्रयोग को पब्लिक इवेंट बनाने की योजना पर विचार कर रहा है। विश्व मे बहुत से देशो के विज्ञान संचारक व अध्यापक नियमित रूप से इस प्रयोग को कर रहे हैं जिनके साथ यमुनानगर को भी इन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर लाया जाएगा। इस प्रयोग मे कार्तिक, अमन, पारस, निखिल, स्पर्ष, सूर्यांश, क्रमिका सान्याल, सुमेधा गल्होत्रा, श्रेया सचदेवा, युक्ता, साविया, आरुषि व पार्थवी ने भाग लिया। इस अवसर पर ममता वर्मा सचदेवा, अमनदीप कौर, शिव कुमार, रोमी, वीना, किरण,विदुषी, मनीषा,मंजू  आदि अध्यापको का योगदान सराहनीय रहा।
२२/०९/२०१३ को पृथ्वी से ISON की स्थिति
अखबारों मे







Sunday, September 08, 2013

आइसोन धूमकेतू पर राष्ट्रीय कार्यशाला भोपाल मे सम्पन्न EYES on ISON Campaign, National Workshop Bhopal

आइसोन धूमकेतू पर राष्ट्रीय कार्यशाला भोपाल मे सम्पन्न EYES on ISON Campaign, National Workshop Bhopal 
 अभियान की चेयर पर्सन प्रज्वल शास्त्री 
3 से 5 सितम्बर 2013 को राष्ट्रीय तकनीकी अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान (NTTTI) भोपाल मध्यप्रदेश मे 'आइसोन पे नज़रे' (Eyes On ISON) राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। भारत ज्ञान विज्ञान समिति भोपाल, विज्ञान सभा भोपाल, विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी  विभाग भारत सरकार नयी दिल्ली, एन सी एस टी नेटवर्क, इंडियन एस्ट्रोफिजिक्स इंस्टिट्यूट बैंगलोर व एमेच्योर एस्ट्रोनोमर्स एशोसिएशन न्यू देहली आदि कि सयुंक्त तत्वाधान मे उत्तरी भारत के हिंदी भाषी प्रदेशों के लिए इस राष्ट्रीय कार्यशाला विभिन्न प्रदेशों से  82 प्रतिभागियों ने शिरकत की।
 इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य नवम्बर माह से जनवरी 2014 तक दिखाई देने वाले धूमकेतु जिसका नामकरण C/2012 S1 ISON आइसोन है के मद्देनज़र राष्ट्रव्यापी अभियान चलाना है। इस अभियान मे आमजन से लेकर स्कूली बच्चो समेत सभी भारतीय नागरिको को खगोलीय जागरूकता के देशव्यापी मुहीम  से जोड़ना है। आइसोन पुच्छल तारे पर पैनी नज़र रखते हुए इसका अवलोकन सुनिश्चित करते हुए बह्मांड के नज़ारे लेकर आनन्दित होना भी इस राष्ट्रव्यापी मुहीम का एक उद्देश्य है।
कार्यशाला का उदघाटन
इस राष्ट्रीय कार्यशाला का उदघाटन तीन सितम्बर को बहुत ही गर्मजोशी के साथ किया गया। उदघाटन सत्र मे श्री एस आर आज़ाद व श्री विजय पटेल ने विभिन्न प्रदेशों से पधारे प्रतिभागियों और राष्ट्रीय स्तरीय संसाधन व्यक्तियों का स्वागत किया। उन्होंने अपने स्वागतीय वक्तव्य मे प्रतिभागियों को कहा कि आप यहां से सीख कर अपने राज्यों मे इस वैज्ञानिक चेतना का पूर्ण शक्ति के साथ संचार करें ताकि इस ज्ञान व वैज्ञानिक चेतना का सर्वव्यापीकरण हो सके। अभियान की चेयर पर्सन प्रज्वल शास्त्री ने विस्तार से अभियान के बारे मे प्रतिभागियों को अवगत करवाया। अपने उद्घाटन भाषण मे मध्य प्रदेश विज्ञान और प्रोद्योगिकी परिषद के महानिदेशक श्री डा० प्रमोद वर्मा ने कहा कि आकाश ने सदा से सभी को आकर्षित किया है आकाश व ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती इसलिए इस मुहीम को केवल विद्यालयों तक ही सिमित ना रख कर इसे चौपालो, महिला मंडलों, हाट व गली कूचो तक ले जाया जाए और विज्ञान को जनोपयोगी बनाया जाए तो निश्चित ही समाज से अंधविश्वास निवारण हो सकेगा।
सचिव मध्य प्रदेश भारत ज्ञान विज्ञान समिति भोपाल श्री विजय पटेल व श्री अनिल धीमान ने पधारे हुऐ वक्ताओं का धन्यवाद किया।  
  डॉ॰  श्री अरविन्द सी रानाडे
विज्ञान प्रसार से डॉ॰  श्री अरविन्द सी रानाडे ने पावर पाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से सौरमंडल व धूमकेतू विषय पर प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने बताया कि हमे जनसाधारण को समझ आ सकने वाले उदाहरणों प्रयोग करते हुए खगोलविज्ञान को आमजन तक ले जाना है।  एक उदाहरण के माध्यम से उन्होंने सूर्य व पृथ्वी के आकार के अंतर को समझाते हुए एक मिसाल दी कि यदि सूर्य को एक 13 इंच व्यास की बास्केट बाल माने तो उसकी तुलना मे पृथ्वी राई के एक दाने के बराबर है।
 डॉ॰  श्री अरविन्द सी रानाडे
यह जनसाधारण को सूर्य और पृथ्वी के आकार मे अंतर को समझाने के लिए आम भाषा की एक मिसाल है परन्तु यह भी ध्यान रखा जाए कि कही गयी बात तथ्यपूर्ण वैज्ञानिक व सैद्धांतिक होनी चाहिये, कोई भी ऐसी विज्ञप्ति नहीं जारी करनी है जिससे मीडिया या अन्य संचार एजेंसीयां कोई दुष्प्रचार कर सके व समाज मे कोई भ्रान्ति या डर फैले।  कोई भी विज्ञप्ति या बयान करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य समाज के हर तबके को धूमकेतू का आनन्दमयी अवलोकन करवाना है ना कि उनमे कोई भय उत्पन्न करना। बाजारीकरण  के इस दौर मे सस्ती लोकप्रियता व धन कमाने की इच्छा से निहित विभिन्न एजेंसियां यदि आप के किसी वक्तव्य को तोड़मरोड़  कर प्रस्तुत करें तो उस की सूचना तुरंत विभाग को देवें अन्यथा प्रतिभागी को आगामी कार्यक्रमों मे शामिल नहीं किया जाएगा।
दिन के समय की जा सकने वाली खगोलीय गतिविधियां 
बहुत ही उचित प्रबंधन से संसाधनों का समुचित प्रयोग करने के उद्देश्य से आयोजको ने सभी प्रतिभागियों को दो समूहों मे बाट दिया व रूचि बनाए रखने के लिए दोनों समूहों को गत धूमकेतुओं के नाम हैली व मेकनायट नामक समूह नामकरण दिया गया। गीता महाशाब्दे, अरविन्द, समीर ने अब अपने कुशल संचालन से दिन के समय की जा सकने वाली खगोलीय गतिविधियां करवाई व साथ ही साथ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के जवाब खोजने के लिए पांच पांच प्रतिभागियों के उपसमूह बनाए, इन उपसमूहों को बाटते हुए भी इस बात का ध्यान रखा गया कि पाँचों प्रतिभागी भी अलग अलग आयु वर्ग व अलग अलग प्रान्तों के हों ताकि समूह चर्चा के दौरान विविधता का समावेश हो सके। इस कार्यशाला मे इस प्रकार का कुशल संचालन भी सीखने  मिला जो कि प्रतिभागियों को अपने अपने प्रान्तों मे इस प्रकार की कार्यशालाओं के संचालन मे मददगार साबित होने वाला होगा। 
लंच 
भूखे पेट भजन नहीं होवे को ध्यान मे रखते हुए अब प्रतिभागियों को आयोजको द्वारा सुपाच्य व शाकाहारी भोजन परोसा गया सबने सलीके से व भरपेट भोजन किया। मध्यप्रदेश के विभिन्न व्यंजनों का आनंद लेते हुए और आपस मे हँसते बतियाते हुए प्रतिभागियों ने आदतन फोटो सेशन भी चलाये और इन लम्हों की यादों को अपने अपने कैमरों कैद किया।  
समूह चर्चा किसी भी ज्ञान को बाटने एवं बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम होता है। कार्यशाला प्रबंधकों व संसाधन शक्तियों ने समूह चर्चा का बहुत अधिक व अति सौहार्द पूर्ण पर्यावरण प्रदान किया।
समूह चर्चा करते प्रतिभागी 
 समूह चर्चा के दौरान लुकेछिपे कुछ प्रतिभागियों ने अंधविश्वास व धार्मिक मान्यताओं को विज्ञान का जामा पहनाने व सही सिद्ध करने की कोशिश भी कि परन्तु वैज्ञानिक व तार्किक चर्चा से उन्होंने अन्ततः चुप्पी मारने मे ही भलाई समझी । ज्योतिष व खगोल विज्ञान मे कौन पहले आया या बाद मे आया किस ने किस से जन्म लिया कौनसा नया है कौनसा पुराना है की चर्चा परिचर्चा मे बहुतेरे प्रतिभागी अपनी राशि व ग्रह शान्ति के उपाय स्वरूप पहनी हुई नगों नीलम, पन्ना, पुखराज व हकीक पत्थरों की अंगूठियों को छुपाते या फिर उन्हें तर्कसंगत सही साबित करते  हुए  भी चर्चा मे अपनी भूमिका भी अदा करते रहे।
प्रतिभागियों के समूह की चर्चाओं का जवाब देते अजय तलवार व समीर 
चर्चा के लिए दियें गए कुछ प्रश्नों मे से थे,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 
पृथ्वी को किसी ने भी सहारा नहीं दिया हुआ है परन्तु फिर भी वो अंतरिक्ष मे लटकी हुई है कैसे ?
चंद्रमा पृथ्वी मे क्यूं नही गिरता?
राशियाँ क्या हैं व सूर्य इन मे है कैसे ?
दिवाली हर साल एक ही दिन क्यूं नहीं आती है ?
धूमकेतू दुर्भाग्य लाते हैं क्या ?
क्या धूमकेतू पृथ्वी पर जीवन को समाप्त कर देगा? क्या आइसोन भी ऐसा ही करेगा?
क्या धूमकेतुओं की पूँछ मे जहरीली गैसे होती हैं, क्या वो सब को समाप्त कर देंगी?
ज्योतिष शास्त्र, अंधविश्वास व सयोंग आधारित चर्चाएँ 
ज्योतिष गणित पर आधारित है, अत् ज्योतिष गलत कैसे  हो सकता है?
खगोलशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र से आया है तो ज्योतिष शास्त्र गलत कैसे हो सकता है? जबकि केपलर व वराहमिहिर भी ज्योतिषी थे !
एक ज्योतिषी ने मेरे पड़ोसी को उसके बारे मे सब कुछ बताया जो कि सच था।
एक ज्योतिषी ने मेरी भतीजी को बताया कि उसकी शादी इस वर्ष हो जायेगी और हुयी भी।
मेरी पडोसन ने गर्भावस्था मे सूर्यग्रहण देखा और उसको जटिलताओं का सामना करना पड़ा।
मेरे चाचा तीर्थयात्रा पर गए और उनकी बीमारी ठीक हो गयी।
हमारी परम्परागत कार्यप्रणाली सदियों से हमारे लिए कारगर हैं, तो वो गलत कैसे हो सकती हैं
बृहस्पति ग्रह मानव के लिए अच्छा और शनि ग्रह मानव के लिए बुरा क्यूं ?
आदि आदि
समूह चर्चा प्रस्तुतीकरण
इन प्रश्नों और चर्चाओं को आयोजको ने बेहद खूबसूरती के साथ पूरे समूह को मंच पर बुला कर प्रस्तुत करवाया जहां पर कुछ प्रतिभागियों ने मनघड़न्त किस्से सुनाकर अपनी बात मे वजन पैदा करने का प्रयास किया परन्तु स्त्राधिकारियों व विषय विशेषज्ञ साहेबानो ने बेहद स्टीक शब्दों मे उनका खंडन किया व व्यवहारिकता को विज्ञान से जोड़ कर जीवन निर्वाह करते रहने की सलाह दी और यह भी बताया कि हमे विज्ञान व आधुनिकता की आड़ मे अपने बड़ों व छोटो की भावनाओं को आहत नहीं करना है। नये शोध व प्रमाणों को दिखा कर अंतर्जाल या पुस्तकों के माध्यम से अपने विचार बदलने के अवसर प्रदान करने पर हर कोई नई सोच के साथ जुड़ कर मुख्यधारा मे आ सकता है ऐसा प्रयास करना है व वैज्ञानिक सोच पैदा करनी है। समूह चर्चा व उस पर विशेषज्ञ टिपण्णी से सब कुछ साफ़ होता नजर आया, सच मे यह सत्र बहुत ही ज्ञानवर्धक था।
विज्ञान बस का अवलोकन करते श्री ए पी खान 
कार्यशाला प्रांगण मे प्रतिभागियों व आम जनता के लिए विज्ञान बस भी आयोजको द्वारा इंदौर से मंगवाई गयी थी। इस बस मे विज्ञान को समझाते हुए बहुत से प्रयोग करके दिखाए जा रहे थे। बस के अधिकारियों ने बताया कि इस विज्ञान बस का अवलोकन लाख से अधिक बच्चे व बड़े कर चुके हैं। विज्ञान संचार मे इस प्रकार के साधनों का विशेष महत्व होता है। इस बस मे एक उत्तम श्रेणी की दूरदर्शी भी शामिल की गयी है जो कि आकाश दर्शन गातिविधि करवाने के काम आती है।
साफ्टवेयर व एनिमेशन विडियो की मदद से अवलोकन की तैयारी  

एमेच्योर एस्ट्रोनोमर्स एशोसिएशन न्यू देहली के उपप्रधान श्री अजय तलवार का यह सत्र बहुत खास था क्यूंकि इस सत्र मे आइसोन धूमकेतू का तिथिबद्ध अवलोकन बताया गया। अजय तलवार जी ने पावर पाइंट प्रस्तुति से विभिन्न साफ्टवेयर व एनिमेशन विडियो की मदद से अवलोकन की सम्भावित तिथियों, अवलोकन स्थल  चयन और तैयारियों के बारे मे विस्तार से बताया। यहीं पर Stellarium साफ्टवेयर का प्रयोग करना भी सिखाया गया और इस साफ्टवेयर की मदद से आइसोन की किसी भी आगामी तिथि की सही सही लोकेशन ली जा सकती है और उसका एनिमेशन भी देखा जा सकता है। 
तैयार खड़ी दूरदर्शियाँ 
आज ही रात्री को आकाश अवलोकन की पूरी व्यवस्था आयोजको ने कर रखी थी परन्तु आकाश बादल युक्त था। रात्री खगोलीय गतिविधियां आकाश साफ़ ना होने की वजह से नहीं की जा सकी उसे अगले दिन तक टाल दिया गया। श्री अनिल धीमान व श्री अजय तलवार ने प्रतिभागियों को बायनाकुलर व दूरदर्शी के बारे मे ज्ञान दिया। अधिकाँश प्रतिभागी न्युटेनीयन परावर्तक दूरदर्शी व बायानाकूलर लेने मे रूचि प्रकट कर रहे थे परन्तु यह बहुत  महंगे हैं। प्रतिभागियों की खास इच्छा थी कि उन्हें धूमकेतू अवलोकन के लिए कोई सस्ता व अच्छा दूरदर्शी व बायानाकूलर मिल सके इसलिए वो सब इनकी जानकारी लेते दिखाई दिए। 

रोल प्ले से खगोलीय ज्ञान का संचार 
रोल प्ले नाटक की ऐसी विधा है जिस मे कोई ओपचारिक ड्रेस आदि की आवश्यकता नहीं होती बस बातो बातों मे ही ज्ञान संचार किया जाता है इसी फन के माहिर प्रशिक्षक यहां दिन भर समूह मे सौरमंडल की बारीकियों को रोल प्ले द्वारा सिखाते रहे। प्रशिक्षु भी इसमें शामिल हो कर कभी पृथ्वी बनते तो कभी सूर्य, सीखने  का यह दौर लंबा चला और रोल प्ले का खगोलीय गतिविधियों मे योगदान स्पष्ट दिखाई दिया व प्रतिभागियों ने इस को बहुत सराहा।
विभिन्न राज्यों से आये प्रतिभागियों से आयोजको ने राज्य स्तरीय कार्यशालाएं करवाने की सम्भावित तिथियाँ व सम्भावित योजनाएं लिपिबद्ध की, यहां देखा गया कि प्रतिभागियों ने बड़े बड़े दावे किये कि वो आइसोन अवलोकन अभियान को सफल बनाने मे अपना पूरा जोर लगा देंगे परन्तु दूसरी तरफ वो वित्तीय समस्याओं की चर्चा करते सुनाई पड़े। शौंकिया तौर पर विज्ञान संचार को अपनाए प्रतिभागी सहज व निश्चिन्त दिखाई दिए परन्तु एन जी ओ व पेशेवर विज्ञान संचारक फंड्स की बाते व चर्चा करते सुनाई दिए खासतौर पर जून 2012 के शुक्र पारगमन अवलोकन अभियान के चर्चे करते रहे।
माडल धूमकेतू 
समीर जी ने सभी समूहों को धूमकेतू के विभिन्न माडल दिखाए व कुछेक बनाने भी समझाए सभी प्रतिभागियों ने गेंद व कागज से आइसोन धूमकेतु का माडल बनाया और उससके खेल खेले। यह गातिविधि बच्चो को बहुत ही पसन्द आने वाली है। खेल खेल मे आइसोन धूमकेतू के बारे मे समझाने वाले यह कम लागत के माडल बहुत ही आकर्षक लगे और कार्यशाला विशेषज्ञ भी बहुत उत्साहित नज़र आये।     
 सांची बोद्ध स्तूप 
इस दौरान कुछ प्रतिभागी कार्यशाला से बचे हुए समय मे व अलसुबह  अपने अपने साधन करके सांची बोद्ध स्तूप व पुरातात्विक संग्रहालय भी देख आये। बौद्ध स्तूप सांची जो कि भोपाल से 40-45 किलोमीटर दूर है का बहुत ही एतेहासिक महत्व है। सम्राट अशोक, नागा, कुषाण, सातवाहन, गुप्त, परमार राजवंशो के बारे मे जानकारी हासिल करते हुए कर्क रेखा पर खड़े होकर भोपाल भ्रमण को सार्थक बनाते हुए ज्ञान मे वृद्धी करते हुए प्रतिभागी अपने अपने अनुभव आपस मे सांझा करते पाए गए।
कर्क रेखा नजदीक सांची 
सांची से आते हुए में रोड़ पर ही मध्य प्रदेश पर्यटन का एक बोर्ड लगा है जो इशारा करता है कि यहां से कर्क रेखा गुजरती है व सड़क पर मार्किंग भी की गयी है। वैसे तो कर्क रेखा पर स्थित एक नयी वैद्शाला का निर्माण उज्जैन के निकट गावं डोंगला मे किया जा रहा है। आने वाले समय मे मध्य प्रदेश का नाम खगोलीय पर्यटन  के क्षेत्र मे भी छाने वाला है।
हाना 
यहां कार्यशाला मे एक फोटोग्राफर के रूप मे ताइवान की एक लड़की हाना सभी के आकर्षण का केन्द्र बनी रही। हाना ने भी भाग भाग कर बड़ी ही मेहनत से सारे कार्यक्रम को बिना थके स्टिल शूट किया और तो और बहुत ही खुशी से अपने लेपटाप से वायरस की परवाह किये  बिना सबको उनके पेन ड्राइव मे उनके मनपसंद फोटो डाल कर दिए उसकी अथक मेहनत भी अन्य आयोजको के साथ साथ तारीफ़ की हकदार बनती है। हाना ने मुझ से गुजारिश की कि वो उनका एक फोटो उनके कैमरे मे ले जो कि कोई भी भारी मेहनताने वाला कार्य नहीं था सो मैंने सहर्ष कर दिया और मुझे भी वो फोटो प्राप्त हुआ। फोटो खिचवाने के स्थान को देखकर लगता है कि शायद हाना भी कुछ कहना चाहती थी उसे भी विज्ञान संचार पर कुछ बोलना था खैर वो अपनी क्षमताओं अनुसार अपना रोल प्ले कर गयी।
नकली फोटो नकली फोटो 
हर कार्यशाला के अंत मे प्रमाण पत्र वितरण का सादा समारोह होता है परन्तु समय की कमी के कारण व प्रतिभागियों को दूर दूर जाना था इसलिए प्रमाण पत्र आयोजको ने लंच के दौरान ही दे दिए। फोटोग्राफी के मद्देनजर जिसे जो भी आयोजक टकरा उसने उसी के हाथो से प्रमाण पत्र प्राप्त करते हुए फोटो खिचवाई तो मैंने भी इसी शोशेबाज़ी मे फस के मोहतरमा हाना को कहा कि वो मुझे प्रमाण पत्र प्रदान करे वो नकली फोटो नकली फोटो कहती गयी और प्रमाण पत्र देकर यो गयी और वो गयी।

मैं सुमित व श्री ए पी खान 
काफी समय बच गया था तभी मेरे स्थानीय फेसबुक मित्र श्रीमान ए पी खान का फोन आया हमने उनसे रामकृष्णा मिशन महाराणा प्रताप नगर व भोजपुर शिव मंदिर देखने की इच्छा जताई तो वो सहर्ष तैयार हो गए और हम उनके सानिध्य मे उनके साथ हो लिए सारे रास्ते खान साहब हमे  इन स्थलों के पुरातात्विक महत्व के बारे मे एक कुशल मार्गदर्शक के रूप मे बताते रहे और वे देर रात्री तक हमारे साथ रहे ....मैं और सुमित कुमार (क्यूरेटर कल्पना चावला मेमोरियल प्लेनेटोरियम कुरुक्षेत्र हरियाणा)  उनके तहे दिल से आभारी है कि उन्होंने अपनी मेहमाननवाजी की छाप हमारे दिल पर छोड़ी। भोजपुर भोपाल से 28 किलोमीटर  की दूरी पर रायसेन जिले में वेत्रवती नदी के किनारे बसा है। प्राचीन काल का यह नगर उत्तर भारत का सोमनाथ कहा जाता है। गाँव से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल शिव मंदिर है। इस नगर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज (1010ई.- 1053 ई. ) ने किया था। अतः इसे भोजपुर मंदिर या भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है।   मंदिर पूर्ण रूप से तैयार नहीं है। मंदिर के अधूरे होने के पीछे भी कई कहानियां हैं। भोजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाने वाला यह मंदिर वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है।  कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। एक प्राचीन बांध के अवशेष मंदिर के पास अब भी देखे जा सकते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भी बांध बनाकर नदी के पानी को संचित करने का प्रयास हुआ था. कहते हैं कि इस बांध का पानी कुल 500 वर्ग किलोमीटर में फैला था।  मंदिर के शिलापट पर लिखित एक और जनश्रुति के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने वनवास के दौरान किया था।
हरियाणा के संसाधन सूत्रों के नाम व पते
श्री सतबीर नागल  हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक
श्री कृष्ण वत्स हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक
श्री डा. चन्द्रशेखर शर्मा एन आई टी कुरुक्षेत्र / हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक
श्री अजमेर सिंह चौहान हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक
श्री राजपाल पंचाल इरादा एन जी ओ कुरुक्षेत्र
श्री सुमित कुमार क्यूरेटर कल्पना चावला मेमोरियल प्लेनेटोरियम कुरुक्षेत्र
श्री सोहन लाल हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति रोहतक
श्री नरेश कुमार हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति रोहतक
श्री दर्शन बवेजा हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक / सी वी रमन विज्ञान क्लब, यमुनानगर

खैर आन्नद और अदभुद अनुभवों के साथ कार्यशाला सम्पन्न हुई, अब घर जाकर प्लानिंग करनी है कि कैसे इस कार्यशाला का ऋण उतारा जाए .....तो बंधुओं हवन  करने से तो काम चलेगा नहीं  इसलिए कमर कस लो और एक एक पाई का हिसाब चुकता करो जो कि सरकार ने आप हम पर खर्च किये हैं।.....धन्यवाद आते रहना हम भी काम करते रहेंगे और लिखते रहेंगे चिट्ठीयां ....आइसोन पर नज़रें 
प्रस्तुति : दर्शन बवेजा, विज्ञान अध्यापक
सी वी रमन विज्ञान क्लब, यमुनानगर हरियाणा   
      

Saturday, August 10, 2013

कहाँ तक पहुंचा इसोन ISON Updates

कहाँ तक पहुंचा इसोन ISON Updates 
साभार नासा 
इसोन धूमकेतु पिछले लगभग 1 वर्ष से चर्चा में है। हाल ही में नासा की इन्फ्रारेड स्पिटज़ेर अंतरिक्ष दूरदर्शी ने इसोन धूमकेतु की तस्वीरे लीं जब इसोन धूमकेतु सूर्य से 3120 लाख मील (5020 लाख किलोमीटर) दूर थास्पिटज़ेर टेलीस्कोप द्वारा लिए गए इन चित्रों में धूमकेतु के पीछे लंबी महीन चट्टानी धूल की पूँछ दिखाई देती है जो कि सूर्य के प्रकाश से चमकती है एक और चित्र  में धूमकेतु के चारों और प्राकृतिक गैसों का वातावरण है जो कि उसी की जमी हुई कार्बन डाइआक्साइड से उत्पन्न कार्बन डाइआक्साइड गैस के रूप में है। इसोन से प्रतिदिन 22 लाख पौंड (10 लाख किलोग्राम)कार्बन डाइआक्साइड गैस उसके चारों और एकत्र होती है शोधकर्ताओं ने बताया कि नासा की इन्फ्रारेड स्पिटज़ेर अंतरिक्ष दूरदर्शी से लिए गए चित्रों से पता चला कि इसोन धूमकेतु के धूल और कार्बन डाइआक्साइड के गुबार उसके पीछे उसकी तीन लाख किलोमीटर लंबी महीन चट्टानी धूल की पूँछ बना रहे हैं

नासा की पैनी नज़र है इसोन पर
नासा के इसोन निरीक्षण अभियान के मुखिया केरी लिस्से जो कि जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी में एक वरिष्ठ अनुसंधान वैज्ञानिक भी हैं, ने बताया कि हमारे अनुमान के अनुसार इसोन धूमकेतु प्रतिदिन दस लाख किलोग्राम कार्बन डाइआक्साइड गैस और 550 लाख किलोग्राम धूल उत्सर्जित कर रहा हैनासा के हब्बल स्पेस टेलीस्कोप और स्विफ्ट गामा रे ब्रस्ट मिशन और डीप इम्पेक्ट अंतरिक्ष यान द्वारा किए गए पूर्व प्रेक्षणों से हमें इसोन से किसी भी गैस उत्सर्जन के लिए केवल ऊपरी सीमा ज्ञात हो पायी थी परन्तु स्पिट्जर ने सुनिश्चित कर दिया है कि इसोन धूमकेतु सभी गतिविधियाँ गैस के द्वारा ही संचालित हैं।

कितना बड़ा और कितनी दूर है इसोन
शोधकर्ताओं का कहना है कि 13 जून के प्रेक्षणों के समय तक इसोन धूमकेतु सूर्य से पचास करोड़ बीस लाख किलोमीटर दूर थाइसोन धूमकेतु पाँच किलोमीटर जितना विस्तृत और बड़ा पिंड है 28 नवम्बर 2013 को यह सूर्य की सतह के सबसे नजदीक यानि कि ग्यारह लाख साठ हज़ार किलोमीटर दूर होगासूर्य के साथ इतनी नजदीकी के समय यह नाटकीय ढंग से लपटें भी उत्पन्न कर सकता है और तब यह आकाश में पूर्णिमा के चंद्रमा से भी अधिक चमकेगा धूमकेतु के हालिया अध्ययन से प्रतीत होता है कि इसका अधिकाँश कार्बन इसमें कार्बन डाइआक्साइड की बर्फ के रूप में जमा पड़ा है जैसे-जैसे यह सूर्य के नजदीक आता जाएगा गर्म होता जाएगा और जुलाई के अंत या अगस्त के आरम्भ में मंगल की कक्षा में पहुँचने पर हम इसमें जमी हुई गैसों का और अधिक पता लगा सकेंगे   
अनुमान व आशंकाएँ
इस कि कोई गारंटी भी नहीं है कि इसोन प्रचलित अनुमानों जैसा रहेगा। यह सूर्य के नजदीक आकर टूट भी सकता है और सदी के अन्य अज्ञात धूमकेतुओं की तरह विस्फोट से असफल भी हो सकता हैकिसी भी धूमकेतु के बारे में स्टीक भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है इसलिए अभी भी इसोन के आकाशीय प्रदर्शन के बारे में भी कोई भविष्यवाणी कठिन कार्य है वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊर्ट क्लाउड से आंतरिक सौरमंडल की और इसोन धूमकेतु का सम्भवतः यह पहला ही दौरा है
ज्ञान की कईं परते खोलेगा इसोन धूमकेतु

नासा के ग्रह विज्ञान विभाग के निदेशक जिम ग्रीन ने एक बयान में कहा है कि इसोन बहुत ही रोमांचक है और हमें इसोन के संगठनात्मक ढाँचे के अध्ययन व एकत्र आँकड़ों के अध्ययन से सौरमंडल के प्रारम्भिक निर्माण के बारे में जानने में बहुत आसानी होगीकुछ अन्य खगोलविदों ने इसोन के बारे में कहा है कि यह धूमकेतु मात्र स्काइ वाचिंग मनोरंजन ही नहीं उससे भी बहुत अधिक बताने वाला है। उनके अनुसार यह इसोन मौलिक निर्माण ब्लॉक, पानी, अमोनिया, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य सामग्रियों से बना मौलिक खगोलीय पिंड भी हो सकता है और यही नहीं यह 4.5 अरब वर्ष पहले की तरह से ग्रहों की निर्माण सामग्री से भरा भी हो सकता है। इससे यह जानने में भी सुराग मिलने की सम्भावना बनेगी कि सौरमंडल के ग्रहों के प्रारम्भिक निर्माण में तब क्या और कैसे हुआ था। साथ ही इस अवधारणा की भी जाँच होने की सम्भावना है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हेतु कच्चा माल धूमकेतुओं से ही आयातित हुआ था या नहीं
बस चंद दिनों की ही प्रतीक्षा रह गयी है। हमें इसोन-सदी के धूमकेतु, के नज़ारे का आनंद लेने के लिए तैयार हो जाना चाहिए हमें आशा करनी चाहिए कि सदी का सबसे बड़ा धूमकेतु हमें निराश नहीं करेगा और इसके खोजकर्ता शौकिया खगोलविदों विताली नेवसकी और अर्त्योम नोविचोनोक की मेहनत बेकार नहीं जायेगी

सी वी रमण विज्ञान क्लब, यमुनानगर हरियाणा  

Saturday, June 22, 2013

23 जून 2013 को दिखेगा सुपर फुल मून Super Full Moon On 23 June 2013

23 जून 2013 को  दिखेगा सुपर फुल मून  Super Full Moon On 23 June 2013
सी वी रमण विज्ञान क्लब के सदस्यों ने सुपर मून को निहारेंगे
कौन होगा जिसे चंद्रमा नहीं लुभाया होगा?  बच्चे ने मामा के रूप मे चंद्रमा को निहारा होगा तो किसी ने चंद्रमा खिलोना अपनी माँ से मांगा होगा। कवियों ने चंद्रमा मे प्रेमी प्रेमिकाओं को रचा होगा तो चित्रकार ने चंद्रमा को चमकीले रंगों मे उकेरा होगा।

चंद्रमा हर दिल लुभावन खगोलीय पिंड है जिसे हम पृथ्वी के उपग्रह के रूप मे जानते हैं यही मात्र एक खगोलीय पिंड है जिस पर मनुष्य भी जा आया है कल तेईस जून को सी वी रमण विज्ञान क्लब के सदस्यों ने सुपर मून को निहारने की योजना बनाई है इस विषय पर आज एक व्याख्यान का आयोजन किया गया जिस मे क्लब प्रभारी दर्शन लाल बवेजा विज्ञान अध्यापक ने क्लब सदस्यों को प्राकृतिक व कृत्रिम उपग्रह, चंद्रमा की कलाओं, अमावस्या, पूर्णिमा, चन्द्र ग्रहण, ब्लयू मून, माइक्रो मून, चन्द्र इन्द्रधनुष, चन्द्र कलैंडर, उपग्रहीय कालोनी, उपग्रहीय छावनी, संचार मे उपग्रह का प्रयोग व सुपर फुल मून के बारे मे विस्तार से बताया।

उन्होंने बताया कि कल तेईस जून को आकाश मे चंद्रमा पूर्णिमा के चंद्रमासे चौदह प्रतिशत अधिक बड़ा और तीस प्रतिशत अधिक चमकदार दिखाई देगा। चंद्रमा पृथ्वी के चारों और दीर्घ वृत्ताकार कक्षा मे चक्कर लगाता है दीर्घ वृत्तीय कक्षा होने के कारण चंद्रमा एक एक बार पृथ्वी से अधिकतम व न्यूनतम दूरी पर होता है। यह दोनों दूरियां अधिकतम चार लाख छह हजार किलोमीटर व न्यूनतम तीन लाख सत्तावन हजार किलोमीटर होती है इन दोनों स्थितियों को क्रमश भू-दूरस्थ (एपोजी) व भू-समीपक (पेरिगी) कहा जाता है। तेईस जून को चंद्रमा पृथ्वी से पेरिगी स्थिति पर होगा इसलिए चंद्रमा बड़ा और चमकीला दिखेगा अगर मौसम ने साथ दिया तब ही हम इसे देख पायेंगे नहीं तो धरती के करीब चंद्रमा फिर एक साल के इंतज़ार के बाद दस अगस्त 2014 में ही दिखेगा लेकिन इस बार जितना निकट फिर पच्चीस नवम्बर  2034  को ही दिखेगा।  सात जुलाई तक चंद्रमा अपनी कक्षा  में पृथ्वी से दूर हो जाएगा यानि एपोजी हो जाएगा और तब चंद्रमा धरती से चार लाख छह हजार किलोमीटर दूर होगा।

चन्द्र इन्द्रधनुष (Moonbow) है दुर्लभतम प्रकाशीय घटना

दर्शन बवेजा ने बताया कि वैसे तो चंद्रमा से सम्बन्धित बहुत सी खगोलीय घटनाएं हैं लेकिन इनमे सबसे दुर्लभ प्रकाशीय घटना है चन्द्र इन्द्रधनुष का बनना। जैसे दिन मे बरसात के बाद आसमान मे इंद्रधनुष रेनबो दिखाई देता है ठीक उसी तरह कभी कभी चन्द्र इन्द्रधनुष भी कहीं कहीं दिखाई देता है यह चंदमा से जुड़ी बहुत ही दुर्लभ प्रकाशीय घटना है। चंद्रमाकी रोशनी का पानी की छोटी छोटी बूंदों से विक्षेपण (डिस्पर्शन) चन्द्र इन्द्रधनुष बनाता है। खगोलप्रेमी ऐसी ही घटनाओं को देखने के लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। चन्द्र इन्द्रधनुष बनने की दो मुख्य शर्ते होती हैं पहली कि चंद्रमा क्षितिज से 42 डिग्री से अधिक कोण ना बनाए दूसरी कि पूर्णिमा और सुपर मून की स्थिति होनी चाहिए। इनके अलावा आकाश साफ व पानी की सुक्ष्म बूंदों की उपस्थिति अनिवार्य है।  दुनिया भर मे केवल कुछ स्थानों पर ही चन्द्र इन्द्रधनुष बनते देखे गएँ हैं।  इन स्थानो में से अधिकांश हवा में धुंध की परतो, वाटर फ़ाल्स  व झरनो के निकट बनते देखे गए हैं। चन्द्र इन्द्रधनुष  बनने के कुछ ज्ञात स्थानों मे से अमेरिका के कैलिफोर्निया में योसेमिते राष्ट्रीय उद्यान, जाम्बिया और जिम्बाब्वे की सीमा पर विक्टोरिया जलप्रपात व हवाई मे वाईमिया है।

क्या सुपर मून प्राकृतिक आपदा का ट्रिगर है?

सुपरमून को लेकर ऐसी अफवाहें  जोरो पर हैं कि सुपर मून आपदाओं का ट्रिगर है, इस घटना से या इसको  देखने से हमारे ऊपर कोई बुरा प्रभाव पड़ सकता है  या यह पृथ्वी पर आपदाएं लेकर आता है। आजतक विज्ञान के पास ऐसा कोई प्रमाण या प्रमाणित उदाहरण नहीं है जो यह साबित करे कि कि सुपर मून आपदाओं का ट्रिगर है। यदि कभी कुछ हुआ भी है तो वो सयोंग मात्र हो सकता है। यह खगोल का एक सामान्य घटना है  इसका किसी भी प्राकृतिक आपदा से कोई सम्बन्ध नहीं है।

सुपरमून शाम पांच बज कर पांच मिनट  मिनट पर नजर आना शुरू होगा। कोई भी नंगी आंख से बिना किसी उपकरण की सहयता से इस खगोलीय घटना का आनंद ले सकता है।  
अखबार मे खबर
 प्रस्तुति:- सी.वी.रमण साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
 द्वारा--दर्शन बवेजा  विज्ञान अध्यापक  यमुना नगर हरियाणा

Thursday, June 20, 2013

आज है इस साल का सबसे सबसे लंबा दिन Summer Solstice 2013

आज है इस साल का सबसे सबसे लंबा दिन Summer Solstice 2013
सी वी रमण विज्ञान क्लब के सदस्यों ने किया पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग

इक्कीस जून का दिन साल का सबसे सबसे लंबा दिन होगा। इस दिन को ग्रीष्म सक्रांति यानि समर सॉल्स्टाइस कहा जाता है। इस दिन सूर्य कर्क रेखा पर होता है और उत्तर की ओर बढ़ता सूर्य इक्कीस जून को कर्क रेखा को छूकर पुनः दक्षिण की ओर बढ़ने लगता है। इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं। सूर्य के उत्तरायन और दक्षिणायन होने के बारे में  क्लब सचिव दर्शन लाल बवेजा ने बताया कि पृथ्वी द्वारा सूर्य का चक्कर लगाने के दौरान पृथ्वी का एक गोलार्द्ध सूर्य से दूर चला जाता है। जिसे सूर्य का उत्तरायन और दक्षिणायन हो जाना कहा जाता है। पृथ्वी पर स्थित दो काल्पनिक रेखाएं कर्क और मकर रेखा है। सूर्य उत्तरायन के समय कर्क रेखा पर और दक्षिणायन के समय मकर रेखा पर होता है। पृथ्वी पर इसी परिवर्तन के कारण ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आगमन होता है। आज के बाद दिन की अवधि छोटी होनी शुरू हो जायेगी जो कि कुछ सेकंड्स प्रतिदिन होती परन्तु बाद मे यह अंतर मिनट्स मे बढेगा यानि  इक्कीस जून के बाद से सूर्य दक्षिण दिशा की ओर गति करना प्रारंभ कर देगा, जिसे दक्षिणायन का प्रारंभ कहा जाता है। अब दिन क्रमशः छोटे होते जाएंगे और फिर तेईस सितंबर को रात-दिन बराबर होंगे।
क्या बदलाव आते हैं मौसम मे
सूर्य के उत्तरायन और दक्षिणायन होने से पृथ्वी के मौसम मे परिवर्तन आते हैं। पृथ्वी पर इसी परिवर्तन के कारण ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आगमन होता है। हमारे यहा पर मुख्यरूप से तीन मौसम होते हैं। ग्रीष्मकाल की अवधि मार्च से जून तक वर्षाकाल की अवधि जुलाई से अक्टूबर तक व शीत काल की अवधि नवम्बर से फरवरी होती है। मौसम में इसी परिवर्तन के साथ हवा की दिशा भी बदलती है। जहां ज्यादा गर्मी होती है वहां से हवा गर्म हल्की होकर ऊपर उठने लगती है और पूरे क्षेत्र में निम्न वायुदबाव का क्षेत्र बन जाता है। ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है। इस कारण मध्य एशिया का भूभाग काफी गर्म हो जाता है। फलस्वरूप हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और निम्न दबाव का क्षेत्र बन जाता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध के महासागरीय भाग पर ठंड के कारण स्थित उच्च वायुदाब की ओर से वायु उत्तर में स्थित कम वायुदाब की ओर चलने लगती है। इसे दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहते हैं। ये हवा समुद्र की और से चलती है इसलिए इसमें जलवाष्प भरपूर होती हैं। इसी कारण एशिया महाद्वीप के इन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है। यह मानसूनी जलवायु भारत, दक्षिण-पूर्वी एशिया में भरपूर वर्षा करती है।
यमुनानगर मे सूर्योदय और सूर्यास्त
यमुनानगर में सूर्योदय प्रातः पांच बजकर बीस मिनट पर और सूर्यास्त सायं सात बजकर उन्तीस मिनट पर होगा। यमुनानगर में इक्कीस जून का दिन चौदह घंटे आठ मिनट इक्कीस सेकंड का  होगा जो कि साल का सबसे बड़ा दिन होगा और रात की अवधि नो घंटे इक्यावन मिनट तथा नून टाइम बारह बज कर पच्चीस मिनट पर होगा। बारह बज कर पच्चीस मिनट पर किसी भी लम्बवत खड़ी वास्तु की परछाई न्यूनतम होगी।
क्लब सदस्यों ने किया प्रयोग
बीस व इक्कीस जून के दो दिन पृथ्वी की परिधि नापने के लिए महत्वपूर्ण होते है क्यूंकि सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत होता है। इस अवसर पर स्थानीय स्वामी विवेकानन्द सरोजिनी कालोनी मे क्लब सदस्यो अमन काम्बोज व कार्तिक ने अपनी टीम के साथ पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग किया। क्लब सचिव दर्शन बवेजा ने बताया कि विश्व के कई देशो के बच्चे एक साथ मिल के तेईस सौ वर्ष पुराना इरेटोस्थनीज प्रयोग करते हैं और विश्व समुदाय के साथ एकजुट होकर विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अपने अनुभव सांझा करते हैं व अपने अपने आंकड़ों का आदान प्रदान करके तुलनात्मक गणनाओं से पृथ्वी की परिधि का आंकलन करते हैं। यह प्रयोग बच्चों को  गणित, भूगोल व खगोलीय गणनाओं को समझने के लिए एक मंच प्रदान करता है। इस बार इस प्रयोग मे अमन, कार्तिक, पार्थवी, पारस, पलक, चारु, अवनी, काजल, अंशी, रीमा, जसमीत, सिमरन, अरुण, पारस बवेजा ने भागीदारी अदा की। सभी क्लब सदस्यों को प्रमाणपत्रो से नवाजा जाएगा। 
अखबार मे खबर